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मंगलवार, 14 मार्च 2017

 चर्च का विदूषक चेहरा ------------------------------------!

चर्च का विदूषक चेहरा ------------------------------------!

"न राज्यम न राजाशीत न दंडो न दंडिका"
          महाभारत का युद्ध समाप्त हो चूका है भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं, हे युधिष्ठिर पितामह मरण सैया पर पड़े हैं--! उनसे आपको राजनैतिक शिक्षा लेनी चाहिए जब भगवान सहित सभी पांडव पितामह के पास पहुचते हैं, उनसे पूछते हैं कि हे पितामह जब राज्य नहीं था और राजा नहीं थे तो सामाजिक व् राज्य ब्यवस्था कैसे चलती थी भीष्म पितामह कहते है हे पुत्र 'न राज्यम न राजाशीत न दंडो न दंडिका' उस समय न राज्य था न कोई राजा था न कोई गलत कार्य करता था न कोई दंड देने वाला था सभी धर्मानुसार चलते थे कार्य करते थे, वह वैदिक युग था सभी वेदानुसार जीवन यापन करते थे, ऐसा था हमारा वैदिक काल का युग -----!
      हजारों लाखों ही नहीं करोणों वर्ष पहले हमारे ऋषियों ने मानवता की एक उत्कृष्ट जीवन शैली बनाई जिसे हम हिन्दुत्व कहते हैं लेकिन पश्चिम मे चर्च ने विदूषक का काम किया (हिंसा, हत्या, बलात्कार को ही धर्म माना) जिसमे भी मतभेद है चर्च का एक वर्ग कहता है की इशू ईश्वर का एक मात्र पुत्र था वही पवित्र आत्मा थी और सभी मनुष्य पाप की संतान है यानी पापी है, यानी इशू मे विस्वास रखना, यहूदियों मे जो परंपरा वादी थे 'ओल्ड टेस्टमेंट' मानते थे उन्होने कील ठोककर मारा, उस समय आंधी पानी आया यहूदी सेना के लोग इससे बचने के लिए कहीं भाग गए- छिप गए मौका पाकर इशू के लोगों ने उसे वहाँ से निकाल कर बचा लिया दूसरे पक्ष का कहना है की इशू मरने के पश्चात जिंदा हो गए एक दूसरा पक्ष है जो कहता है कि इशू को शूली पर चढ़ाया ही नहीं गया था, एक और पक्ष आज एक सोध के अनुसार इशू नाम का कोई ब्यक्ति पैदा ही नहीं हुआ चर्च ने इशू के जीवन की एक कहानी गढ़ी।
चर्च द्वारा गढ़ा हुआ धर्म------!
        ईसा पूर्व यूरोप, अमेरिका, कनाडा इत्यादि देशों मे बहुदेव-वाद था समन्वित सभ्यता परक ब्यवहार, विभिन्न संस्कृति प्रतिरूप की मान्यता थी, मूलतः प्रारम्भिक "चर्च-धर्म" गढ़ने वाले ईसाईयों का एक समूह एकल सर्वसत्ता की सर्वोच्चता मे विस्वास करता था जो एक देवतावाद मे विस्वास था प्रचलित बहुदेवतावाद से अलग था, ईसाई धर्म गुरुओं ने जनता को ईश्वर से भय-भीत किया, उसकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करो, यही मनुष्य का सम्पूर्ण कार्य है ईश्वर से भयभीत रहना आवस्यक है वही मृत्यु के देवता हैं, वही नर्क मे भेजता है इसलिए मै तुमसे कहता हूँ की ईश्वर से भयभीत रहो, ( तत्कालीन पॉप की मन गढ़ंत ) तीसरी शताब्दी के 'फादर टरतूलियन' ने कहा की यह समझ से परे है कि कैसे ईश्वर भय की मांग कर सकता है, (जो डरवाता है वह कैसा ईश्वर है) लगता है ईश्वर-ईश्वर न होकर कोई राजा अथवा सामंत हो ।
स्त्री बिमर्श-----!
       "कोरियनथान" को लिखे अपने पहले पत्र मे 'सेंटपाल' ने पुरुषों की श्रेष्ठता का कारण स्पष्ट करते हुए लिखा है ब्यक्ति मूलतः स्त्री से उत्पन्न नहीं होता लेकिन स्त्री पुरुष से बनती है उसका शृजन महिलाओं के लिए नहीं होता अपितु पुरुष के लिए ही महिलाएं होती हैं, चर्च के अनुसार महिलाओं को पुरुषों की आज्ञाकारी भूमिका मे रहना चाहिए, मै किसी महिला को शिक्षक बनने की आज्ञा नहीं देता और न ही उसे पुरुषो पर अधिकार प्रदान करना चाहता हूँ, चौथी शताब्दी मे ईसाई पुजारियों ने महान विद्वान 'हाइपातिया' को मृत्युदंड दिया तो सेंटश्रीर्ल ने कहा कि वह एक महिला थी और ईश्वर के आज्ञा की अवहेलना करते हुए पुरुषों को शिक्षा दे रही थी। महिलाओं को डायन, चुड़ैल बताकर हत्या करने वालों को पारिश्रमिक तौर पर अलग -अलग नियम थे --
@ खौलते तेल के कड़ाही मे उबलने के लिए 48 फ्रैंक, @चक्का या पहिया के ऊपर रखकर मारने का दस फ्रैंक, @ हाथ-पैर मे रस्सी बांधकर घोड़े द्वारा चार टुकड़े करने के लिए 30 फ्रैंक, @ जीविता को कब्र मे गाड़ने के 2 फ्रैंक, @चुड़ैल स्त्री को जलाने के लिए 28 फ्रैंक, @ नाक,कान, जीभ काटने के 10 फ्रैंक, दहकते लोहे से दागकर मारने के 10 फ्रैंक, @ जिंदा स्त्री की चमड़ी उतारने के 28 फ्रैंक इस प्रकार बिभिन्न देशों में चर्च के कारनामो की सूची बड़ी लंबी है ।
        चर्च के 'फादर टेर्टुलियन' ने कहा " क्या तुम नहीं जानती हो की तुम 'इव' हो ? तुम ईश्वरीय विधान की अवज्ञा करने वाली हो तुमने ईश्वर के प्रतिक और उसके स्वरुप ब्यक्ति को नष्ट किया, ईसाईयों ने सभी दुर्गुण महिलाओं में देखा स्त्री अतिलोलुप प्राणी है, इसमें निरंतर अकुलता बनी रहती है, निरंतर क्षरण के लिए बनी है, वह विद्रोह का घर है, जादू-टोना के अपराध में पकड़ी गयी महिलाओं के साथ कई दिन तक बलात्कार किया जाता था, जब किसी मनुष्य को कामेक्षा होती तो उसे महिलाओं को ही अपराधी माना जाता कि उनके कारन ही पुरुषों को कामेक्षा होती है इसलिए वे उन महिलाओं के साथ निर्दयता पुर्बक बलात्कार करते थे, महिलाओं के स्तनों और जननांगों में नुकीले काटें, गर्म लोहे की क्षड़ों आदि से प्रहार करते, पादरी कभी -कभी अपनी 'कामेक्षा' हेतु किसी भी स्त्री को जादूगरिनी घोषित करते थे और उसके साथ सम्भोग की तृप्ति हो जाने पर निर्दयता पूर्बक हत्या कर देते। 
हत्यारा होने का गौरव------
           धर्मोपदेशक पादरियों द्वारा बड़े गर्व के साथ घोषणा की जाती की उन्होंने कितनी स्त्रियों की हत्या की, वर्टाजवर्ग के पादरी द्वारा यह दावा किया गया की उसने पाँच वर्षों में उन्नीस सौ महिलाओं की जादू-टोना के अपराध में हत्या की, दूसरी ओर बेनेडिट- कार्पजो का दावा था कि उसने बीस हज़ार शैतान के पुजारियों की हत्या की. चर्च ने यूरोप से यहूदियों और मूर्तिपूजक प्राचीन ईसाई समूहों को समूल विनष्ट कर दिया, थोड़े से लोगो को धर्मान्तरण करके छोड़ा गया इन हत्यावों के कारन यूरोप में सांस्कृतिक, धार्मिक, चिकित्सकीय, कलात्मक और ज्ञानात्मक क्षमता का इतना विनाश हुआ कि समाज को अपनी दशा सुधारने में शताब्दियों लग गया, 1492 मे कोलंबस अमेरिका की धरती पर उतारा तो वह उसे भारत समझ मूर्ति पूजक भारतियों को अपने पवित्र विस्वास मे धर्मांतरित करना चाहिये, इस उद्देश्य पूर्ति हेतु हजारों अमेरिकन को दास बनाया, धर्मांतरण हेतु बाध्य किया जो मतांतरण नहीं करते उनकी हत्या की जाती, महिलाओं के साथ बलात्कार करना अपना अधिकार समझते, धीरे-धीरे अन्वेषक भारत मे फैल गए सोलहवी- सत्रहवी शताब्दी मे अड़तालीस हज़ार गाओं के लोगों की हत्या की, इस प्रकार हम देखते हैं कि चर्च ने संगठित तरीके से न्याय की मूल प्रवृती की हत्या की और लूट-पाट, हत्या को ही उसने धर्म घोषित किया ।               
 चार कथानक -----
         चर्च द्वारा एकरूपता बनाये रखने का प्रयास कभी पूर्ण रूप से सफल नहीं रहा, यहाँ तक की चारो कथानकों में एक दूसरे में भिन्नता पायी जाती है वे एक दूसरे के बिरोधी भी है, मैथ्यू कथानक-- यीशु एक संभ्रांत ब्यक्ति था जो डेविड से सिलोमन में अवतरित हुए थे जबकि ल्यूक कथनक कहता है कि यीशु सामान्य परिवार के सहृदय लोगों में से एक थे, मार्क का कथानक है कि यीशु एक गरीब बढ़ई के रूप में पैदा हुए थे, मैथ्यू के अनुसार यीशु के जन्म के समय राजाओं की भीड़ उन्हें देखने के लिए गयी, जबकि ल्यूक के अनुसार उन्हें गड़ेरिये देखने गए थे, एक कथानक के अनुसार इशू नाम का प्राणी पैदा ही नहीं हुआ था।
रोमन यहूदियों का युद्ध-----
          ईसामसीह संभवतः अपने जीवन कालमें राजनैतिक, आध्यात्मिक परिवेश में आवस्यक सुधार चाहते थे और उसका नेतृत्व कर रहे थे इस प्रकार हिब्रू और ग्रीक भाषाओँ मे क्राइस्ट का अर्थ नेता अथवा राजा के प्रकार्यात्मक उपाधि से है, तात्कालिक राजनैतिक परिवेश को दृष्टि में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि उनके क्रिया कलाप के कारन उनकी हत्या यहूदियों ने न करके रोमनों ने किया था, "रोमनवासी मृत्यु दंड के रूप में लोगों को क्रास पर लटका देते थे, रोम के अधिपत्य का प्रतिरोधी क्रास यहूदी लोगो का प्रतिक था, ईसाईयों ने अपने धार्मिक विस्वास के रूप में रोम वासियों के परंपरागत विस्वासों के कुछ मूल-भूत तत्वों को सामिल कर लिया था, जैसे रोम वासियों का मानना था कि मिश्र का सम्बन्ध सूर्य देवता हेलियोज और अपोलो से है, मिथ्रका जन्मदिन २५ दिसंबर को मनाया जाता है और उसे यीशु के जन्मदिन के रूप में स्वीकार कर लिया गया, उनका मानना था कि शिशिर ऋतू में सूर्य देवता वापस आते हैं और यही समय है जब ईसाई ईस्टर की छुट्टी मानते हैं, रोम में वेटिकन पहाड़ी पर स्थिति एक गुफा मंदिर को ईसाईयों ने मिथ्र को समर्पित किया और इसे कैथोलिक चर्च का प्रमुख स्थान बना दिया इसके सर्बोच्च पुजारी का नाम पीटर-पैत्राम था जो रोम के विशप का पद नाम पापा -पॉप बन गया था।
चर्च द्वारा विध्वंश का दौर--
            विद्वानों और कलाकारों ने अपने विचारों को निर्भीकता के साथ जनता के सामने रखना शुरू किया दर्शनशास्त्र और स्थापत्य कला के क्षेत्र में नवीनता का सूत्र पात हुआ चर्च द्वारा फैलाये जाने वाला भ्रम जन सामान्य को भ्रमित नहीं कर पा रहा था, फिर क्या था -?? चर्च का भयावह चेहरा सामने आने लगा संगीत, नाट्य, मनोरंजन, काब्य, कला, पेंटिंग आग लगा समाप्त करने का प्रयत्न किया गया, इन सबके कारन समाज में पादरियों के प्रति घृणा का भाव बढ़ रहा था पादरियों को भी जनता से दुरी बनाकर छिपकर रहना पड़ता था, जिस चर्च ने शक्ति पूजा को बिरोधी घोषित किया था वे जनता के सामने घुटने टेकते हुए देवियों के स्थान पर 'मैरी' को रखा ईसामशीह के अतिरिक्त महिला को देवी स्वीकार करना एकेश्वरवाद टूट ही गया, विशेष रूप से लैटिन और इटली के कवियों द्वारा लिखी गयी पुस्तकों का रूपांतरित दस्तावेज महिलओं के गहने संगीत वाद्यों और कलाकृतियों को १४९७ में बड़े पैमाने में जलवा दिया, सन १२०४ में इस के सैनिकों ने 'कांस्टेनटिनोपल' में उत्तेजनात्मक हिंसा फैलाई महिलाओं के साथ बलात्कार किया पुरे शहर को लुटा और जला दिया, कथा लेखक 'ज्योफ्रे क्लिहाईडूइन' के अनुसार इस जगत के निर्माण के बाद किसी नगर से इतनी अधिक मात्रा में लूट नहीं हुई, मानवता के प्रति जो सबसे घृणित कार्य किया जा सकता था वह चर्च के धर्मयोद्धाओं ने इस नगर मे नागरिकों के साथ किया, पॉप की सत्ता को चुनौती देने वाला कोई भी नागरिक सपरिवार समाप्त कर दिया गया, बाइबिल के एक पद को इस घटना के समर्थन में उलेख किया गया- "जो मेरे शत्रु हैं जिनपर मै शासन नहीं कर सकता, उन्हें मेरे समक्ष समाप्त होना होगा ऐसे लोगों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए" इस आक्रमण के बाद एक लैटिन सामंत पॉप के अधीन रहकर १२६१ तक यहाँ शासन करता रहा। 
चर्च व पॉप का सत्ता पर नियंत्रण -----------!
         चर्च ने बड़ी ही योजना पुर्बक रोम के राजा को फंसाया धीरे-धीरे राजा पर चर्च ने सिकंजा कस लिया राजा पॉप का कठपुतली बन गया, पादरियों ने सबसे पहले राजा के पुत्र को अविस्वासी करार देकर उसको मृत्यु दंड दिला दिया, उसके बाद पॉप ने रानी पर निशाना साधा नारी स्वर्ग के रास्ते मे बाधक है नरक का द्वार है धीरे धीरे रानी को चुड़ैल घोषित करा पानी मे उबालकर हत्या करा दी, राजा बूढ़ा हो चुका था बहुत आसानी से राजा के मरने के पश्चात पॉप रॉम साम्राज्य का शासक बन बैठा फिर क्या था ! प्रसिद्ध इतिहासकर फिलिप शाह ने लिखा है "वह पादरी राजाओं को हटाता था, सामान्यजन को विशेषाधिकार देता था, बिद्रोहियों को कुचलता था, भूमि हस्तांतरण करता था, लोगों से दंड वसूलता था अपराधियों को मृत्यु दंड देता था। न्यायालयों के अधिकारों का अतिक्रमण करता था, राष्ट्र के संहिताओं का निर्धारण करता था यानी सर्बोच्च अधिकार प्राप्त चर्च हो गया था पॉप मे अधिकार के प्रति निरंतर बढ़ती जा रही थी, धर्मयुद्ध लड़ने की मानसिकता चर्च ने तैयार की इसलिए उन्होने चर्च के शत्रुओं को निर्दयता पूर्बक कुचल डाला, पूरे यूरोप के सत्ता के सर्बोच्च शिकार पर पॉप मौजूद हो गए, इन परिस्थितियों के नियंत्रण हेतु पॉप ने 1219 मे पुजारियों के लिये रोमन कानूनों के अध्ययन पर प्रतिवन्ध लगा दिया तथा पेरिस विश्वविद्यालय मे अध्यापन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया ।
चर्च के कुछ नियम और प्रताड़ना के तरीके ----              जिन लोगो ने चर्च को स्वीकार नहीं किया उनके लिये पॉप ने अन्वेषक ब्यवस्था खड़ी की जिसमे जगह -जगह प्रताड़ना कच्छ बनाए 1363 मे अन्वेषकों ने प्रताड़ना के असीमित अधिकार प्राप्त कर लिये कि वे रक्त-पात संबंधी अपराधों से मुक्त रहेगे इस प्रकार पॉप ने लोगो की हत्या का लाइसेन्स स्वयं जारी किया था, क्योकि दुष्टात्मा की प्रताड़ना करना हत्या करना उनके अधिकार मे सामील था, पानी, छड़, बेंत इत्यादि से प्रताड़ित करना सामान्य विधि थी, दोषियों को तेल या चर्बी से मला जाता और उन्हे धीरे -धीरे आग मे जलाकर भुना जाता था, लोगो को मरने के लिये बड़े-बड़े आँवा बनाए गए थे, इन भट्ठियों मे लोगो को जिंदा जलाया जाता था, बस्तुतः नाजी जर्मनी मे बीसवीं शताब्दी मे जो अत्याचार हुए वह प्रयोग चर्च ने पहले ही कर रखा था, एक भयंकर प्रताड़ना का तरीका दोषी के पेट मे उसके मलद्वार द्वारा चूहों को डालना था, दोषी ब्यक्ति को इस प्रकार प्रताड़ना देने के लिये एक बर्तन मे चूहों को आग मे गरम किया जाता, इसके बाद इस बर्तन को अपराधी को नंगाकर उसके नितंभ मे बांध दिया जाता था जिससे चूहे घबड़ाकर अपराधी के मलद्वार से पेट मे चला जाता था, क्या कोई दोषी ब्यक्ति इस प्रकार का कष्ट सहन कर सकता है-? कभी -कभी अपराधियों को सर्ब्जनिक स्थानो पर जिंदा जला दिया जाता था।                 
       "विगत दो हज़ारा वर्षों मे चर्च द्वारा सौ से अधिक संस्कृतियों, सभ्यताओं, पंद्रह सौ से अधिक विशिष्ट जातियों को समाप्त करना तथा एक करोण से अधिक महिलाओं का समूहिक कत्ल किया गया, ईसाई रिलीजन स्थापना हेतु डेढ़ सौ करोण से अधिक लोगो की हत्या की गयी पश्चिम के अंग्रेज़ इतिहासकारों ने बड़ी ही परिश्रम पूर्वक इन हत्याओं का विवरण उपलब्ध कराया है"।  

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

राष्ट्रीय एकता का महान पर्व गंगासागर मेला साजिस का शिकार --!------

राष्ट्रीय एकता का महान पर्व गंगासागर मेला साजिस का शिकार --!------

        

         सब तीर्थ बार-बार गंगा सागर एक बार -
          यह वास्तव मे कोई कहावत नहीं वास्तविकता है  भारत वर्ष का अध्यात्म भारतीय समाज मे इतना गहरा चुका है की विधर्मी यानि परकीय धर्म के जानने वाले इसे समझ नहीं सकते ! जब हम भारतीय अध्यात्म की बात करते हैं तो हिन्दुत्व स्वाभाविक ही आ जाता है और जब हम हिन्दुत्व की बात करते हैं तो वहाँ भारतीय धर्म यानि सनातन धर्म और इसे हम भारत भक्ति-देश भक्ति कह सकते हैं भारतीय समाज यानी हिन्दू समाज का स्पंदन धर्म ही है कहते हैं भारतियों को कुछ भी कहो वह सह लेगा लेकिन यदि उसके धर्म को अपने छेड़ा तो उसकी सहनशीलता समाप्त हो जाती है इस्लामिक कल मे धर्म को छेड़ा उन्हे समाप्त होना पड़ा अंग्रेजों ने धर्म को छेड़ा उन्हे जाना पड़ा, ऐसा क्यों होता है इसे समझने की आवस्यकता है देश भक्ति और धर्म को बाटा नहीं जा सकता दोनों एक दूसरे का पर्याय है ।
          गंगासागर का मेला-------!
          इसी कारण जब-जब इस्लामिक हमले अथवा अंगर्जों के हमले हुए धर्म ने ही हमे और हमारे देश को बचाया इसीलिए कहा जाता है कि "जब हम धर्म की रक्षा करेगे तो धर्म अपने-आप धर्म हमारी रक्षा करेगा" हम सभी जानते हैं भारत की सभी नदियाँ गंगाजी मे मिलती हैं, जहाँ गंगाजी समुद्र मे मिलती हैं वह भाग गंगासागर कहलाता है कहते हैं कि कपिल मुनि का आश्रम वहीं था राजा सगर के दस हज़ार पुत्रों को कपिल मुनि ने शाप देकर यहीं भस्म कर दिया था राजा भागीरथ ने अपने पुरखों के मुक्ति हेतु गंगाजी को स्वर्ग से धरती पर लाये आज पूरा भारत नहीं तो कम से कम उत्तर भारत का भरण पोंषण इसी को हम मुक्ति कह सकते हैं इसी कारण इस नदी को भारत मे माता का स्थान सबसे पवित्र मोक्षदायनी यहाँ तक सभी हिन्दू यह चाहते हैं कि जब मेरी मृत्यु हो तो कम से कम मेरी अस्थि गंगाजी मे डाला जाय , आप यह समझ सकते हैं जब गंगाजी का इतना महत्व है तो गंगासागर का कितना महत्व होगा इसी कारण हजारों लाखों वर्ष पहले जब भगवान भास्कर दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं दो ऋतुओं का मिलन उसी मकर संक्रांति के दिन यह गंगासागर का प्रमुख स्नान होता है यह राष्ट्रिय एकता, समरसता, प्रेम व अध्यात्म का मेला लगाना शुरू हुआ जहाँ सारे विश्व का हिन्दू अपने जीवन मे कमसे कम एक बार यहाँ आना चाहता है ।
           राष्ट्रीय एकता का महत्व -----!
           भारतीय धर्म का स्पंदन ही भारतीय राष्ट्र की आत्मा है, जब अंगर्जों ने बंगाल को बाटने का षड्यंत्र किया तो जिस प्रकार लोकमान्य तिलक जी ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक कर देश आज़ादी का मंच बना दिया बिपिन चन्द्पाल ने दुर्गा पूजा को सार्वजनिक कर स्वतन्त्रता आंदोलन को धार दिया उसी प्रकार रवीद्र नाथ टैगोर ने बंग- भंग आंदोलन को धार देने हेतु 1904 मे गंगासागर मेले को आंदोलन का मुख्य सेंटर बनाया और वे सफल हुए इसी कारण जब भारतीय धर्म व अध्यात्म की बात होगी तो देश और धर्म को बाटा नहीं जा सकता, आज इस महान राष्ट्रीय पर्व मेला गंगासागर को कुछ सेकुलर ताकते कहीं न कहीं समाप्त करने की सजिस कर रही है, उन्हे यह समझ मे नहीं आ रहा है कि भारत कि एकता अखंडता मे अध्यात्म, तीर्थ, त्योहार और मेलों कि महत्व पूर्ण भूमिका है भारत मे चार स्थानों पर कुम्भ, सभी महापुरुषों के जन्म स्तनों पर मेला लगभग सभी नदियों मे स्नान यह हमारी परंपरा ही नहीं है बाकी राष्ट्रीय एकता के स्तम्भ है।
       षड्यंत्र--------!
       हिन्दू समाज बहुत सीधा सादा वह सामने वाले को समझ नहीं पाता उसे लगता है कि हम जैसे हैं सामने वाला वैसे ही है असलियत कुछ और ही है प्रत्येक मुसलमान काइस्लामिक कर्तब्या है कि सारे विश्व का इस्लामिकरण करना इसी साजिस के कारण मौलाना आज़ाद भारत मे रह गए वे 'जमायाते इस्लामी हिन्द' के अध्यक्ष थे जिसका उद्देश्य है कि सम्पूर्ण भारत का इस्लामिकरण करना यही वह स्थान है जहां हिन्दू फेल हो जाता है उसकी उदारता ही उयकी मुसीबत बन जाती है मैंने एक पुस्तक पढ़ी है उस पुस्तक का लेखक एक बंगाल काइडर के आईपीएस ने लिखी है जिसमे ममता चटर्जी का निकाह हुआ है उसके कलमा पढ़ा है इस कारण वह हिन्दू हितैसी कैसे हो सकती है आज प बंगाल मे 30% मुसलमान हो गया है जिसमे 50% से अधिक बंगलादेशी घुष्पैठिए हैं आईएसआई वहाँ फल -फूल रही है आए दिन हिंदुओं पर हमले होते हैं मंदिरों का तोड़-फोड़ करना, हिन्दू बहन बेटियों के साथ बलात्कार, बलात धर्मांतरण आम बात है धीरे-धीरे हिन्दू पलायन करना शुरू कर दिया है, भविष्य मे यह प्रांत कश्मीर और फिर इस्लामिक देश की मांग की तरफ बढ़ रहा है, प बंगाल का मुर्सीदाबाद जिला जहां के राशन कार्ड, आधार कार्ड व नागरिकता प्रमाण पत्र के आधार पर करोणों बंगलादेशी पूरे भारत मे भरे पड़े है इसकी जांच क्यों नहीं हो रही ?
        स्थित कैसी है------?
        गंगासागर का मेला दक्षिण परगना जिला मे लगता है जिसकी मुस्लिम जनसंख्या 70% हो गयी है गंगासागर 'काक द्वीप' मे स्थित है जो कोलकता से 80 किमी दूरी पर है "केचु बैरिया" जो मूल मेले का स्थान है सारे द्वीप मे मुस्लिम आवादी ही है कोई भी सेवा कार्य के लिए स्थान पाना संभव नहीं है मेले मे आई हुई महिलाओं से छेड़-छाड़ आम बात है कोई रोक -टॉक नहीं यदि आप किसी पुलिस अथवा पुलिस अधिकारी से सिकायत करते हैं तो उसका उत्तर होता है कि यहाँ क्यों आए हो ? कलकत्ता के ब्यापारी केवल कलकत्ता मे सेवा देते हैं क्योंकि उनके सुरक्षा कि कोई ब्यवस्था नहीं है, इस वर्ष तो हद पार गया था गंगासागर मे जाने वाली कोई भी महिला इस्लामी गुंडों से सुरक्षित बच नहीं सकी कि जिसका कोई न कोई जेवर -सामान छीन न लिया हो -! लगता ही नहीं था कि यह तीर्थ भारत मे है मुस्लिम लुटेरों, गुंडों से भरा मेला जैसे ये गुंडे ही मेले के मालिक हों, कोई शिकायत नहीं उन्हे तो जान बचाकर आना था ? जो लोग लौट कर आए हैं अब दुबारा जाने का नाम नहीं और सामने वाले को मना करना अब गंगासागर जाने लायक नहीं रह गया क्योंकि यह तीर्थ अब इस्लामिक गुंडों के हवाले है, बंगाल का शासन -प्रशासन बड़ी ही योजना पुर्बक हिंदुओं के सारे के सारे पर्व, मेला व त्योहार बंद कराने की योजना मे है, जिन महापुरुषों ने इन सारे राष्ट्रीय पर्वों को प्रारम्भ कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया था उन महापुरुषों के मंसूबों पर ममता सरकार पानी फेरने का काम कर रही है और राष्ट्र बिरोधी कृत्यों मे ब्यस्त है । 
          एक ही उपाय है कि जितने हिन्दू संगठन है, मठ मंदिर है, जितने बड़े धार्मिक मेले हैं उनके सुरक्षा ब्यवस्था भारत सरकार स्वयं करे अब हिन्दुओ के सामने कोई बिकल्प नहीं है, बंगाल सरकार से हिन्दू समाज का भरोसा उठ सा गया है सीधे बंगाल "ग्रेटर बांगलादेश" की तरफ बढ़ रहा है कहीं हम लेट न हो जाय कि गाड़ी छूट जाय ------!!        

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

 सम्राट हेमचन्द विक्रमादित्य --------------!

सम्राट हेमचन्द विक्रमादित्य --------------!



      परायी तलवार --------------!
          हुमायूं को पराजित कर शेरशाह सूरी गद्दी पर बैठा मुगलों, तुर्कों का अत्याचार लगातार हिन्दू समाज पर बढ़ता ही गया 'हेमू कलानी'नाम का एक अग्रसेन बंशी दिल्ली के पास रेवाणी गाँव का निवासी जो छोटा-मोटा ब्यापार करता था (कहते हैं कि वह ठेला पर 'चाट' लगाता था ) और फिर बारूद का काम करने लगा एक दिन उसने दिल्ली की एक गली मे देखा कि सरे आम रास्ते मे एक राजपूत का लड़का अपनी पत्नी अथवा बहन को लेकर जा रहा था तब -तक कुछ तुर्कों का झुंड आकर उससे छेड़-छाड़ करने लगे राजपूत ने अपनी तलवार निकाल ली युद्ध शुरू हो गया, कई तुर्कों को उसने मौत के घाट उतार दिया और वह लड़की भी युद्ध करते मारी गयी, लेकिन वह अकेला था पीछे से वार मे घायल हो गया वह पराजित ही नहीं बीर गति को प्राप्त हुआ, यह घटना 'हेमू' देख रहा था हेमू को उस राजपूत लड़के ने बहुत प्रभावित किया, जब सब मुसलमान चले गए तो उसने उस राजपूत लड़के की तलवार उठा लिया उस तलवार को हेमचंद हमेसा अपने पास रखते थे, तय किया कि पृथबिराज चौहान के पतन के पश्चात भारत मे हिंदुओं की दुर्दशा उसे देखी नहीं जाती थी---!
          हेमचन्द ने उस राजपूत की वीरता, सौर्य की प्रतिज्ञा किया कि मै हिन्दू साम्राज्य की पुनर्स्थापना करुगा फिर वे आगे बढ़ना शुरू किया और एक दिन अपनी बुद्धि, बिवेक व शौर्य के बल दिल्ली की सिपाही हुआ फिर दिल्ली का कोतवाल और फिर दिल्ली का शासक बना, मुगल हुमायू को शेरशाह सूरी ने पराजित कर सत्ता हथिया ली अवसर पाकर हेमू की योग्यता देख दिल्ली का शासक नियुक्त किया 1545 मे सूरी की मृत्यु हो गयी आदिलशाह गद्दी पर बैठा उसने ग्वालियर के किले मे इनकी प्रतिभा देख अफगान सेना का सेनानायक व प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया अब हेमू ने अपने प्रतिभा व शौर्य दिखाने का समय मिल गया बुद्धि और विवेक के बल हिन्दू राज्य की विस्तार योजना शुरू कर दी उसने अफगान सामंत जो टेक्स नहीं देते, ऐसे अनुशासन हीनों को कुचल डाला योजनवद्ध तरीके से धीरे -धीरे मुस्लिम सुल्तानों- सामंतों को समाप्त कर जगह-जगह राजपूत सामंत नियुक्त कर वह दिल्ली का असली शासक बन गया।
         हुमायु की मृत्यु के पश्चात 24 जनवरी 1956 को अकबर गद्दी पर बैठा पंजाब के कलानौर मे 24 फरवरी को 14 वर्षीय अकबर का राज्याभिषेक हुआ, सेकुलर इतिहासकारों ने ये तो लिखा कि हुमायूँ के बाद शेरशाह सूरी दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुआ, इन्हीं इतिहासकारों ने हेमचन्द विक्रमादित्य को भुला दिया जो यह कहते नहीं थकते की भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान थे पर इतिहास की किसी किताब ने सायद भूल की, नहीं बताया कि शेरशाह सूरी और अकबर के बीच दिल्ली की गद्दी पर पूरे वैदिक रीति से राज्याभिषेक करवाते हुए एक हिन्दू सम्राट राज्यासीन हुए, जिन्होंने 350 साल के इस्लामी शासन को उखाड़ फेंका, इन इतिहासकारों ने यह नहीं लिखा कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने के बाद मध्यकालीन भारत के इस अंतिम हिन्दू सम्राट ने "विक्रमादित्य" की उपाधि भी धारण की थी, अपने नाम के सिक्के चलवाये और गो हत्या के लिये मृत्युदंड की घोषणा, इन्होंनें 1553 से लेकर 1556 तक इस पराक्रमी शासक ने अपने जीवन में 24 युद्ध का नेतृत्व करते हुए 22 में विजय पाया, ग्वालियर इत्यादि से हिंदुओं को सेना मे भर्ती कर अपनी स्थिति मजबूत कर ली, हेमू ने तुगलकवाद की लड़ाई मे 6 अक्तूबर को मुगल सेना को पराजित कर दिया लगभग तीन हज़ार मुगल सैनिक मारे गए, मुगल कमांडर बेग दिल्ली छोडकर बचे खुचे सैनिको के साथ भाग गया अगले दिन दिल्ली के पुराने किले मे हेमू का राज्याभिषेक हुआ, मुस्लिम शासन के 350 वर्ष पश्चात उत्तर भारत मे पुनः हिन्दू राज्य स्थापित हुआ, अकबरनामा के अनुसार हेमचन्द विक्रमादित्य काबुल पर चढ़ाई की तयारी कर रहा था और अपनी सेना मे कई बदलाव किए ।
        दिल्ली आगरा के पतन के पश्चात कलानौर मे मुगल परेशान हो गए कई मुगल सेनानायक हेमचन्द से लड़ने के बजाय काबुल की तरफ जाने को तैयार हो गए, बैरम खान युद्ध के पक्ष मे था निर्णय बैरम के पक्ष मे हुआ अकबर ने एक बड़ी सेना लेकर दिल्ली की तरफ कूँच किया 5 नवंबर को पानीपत का ऐतिहासिक युद्ध हुआ मैदान मे दोनों सेनाओं का सामना हुआ, बैरम खान और अकबर ने युद्ध मे भाग नहीं लिया तय किया कि यदि युद्ध हार जाएगे तो वापस काबुल लौट जाएगे, बीर पराक्रमी हेमचंद विक्रमादित्य ने अपनी सेना का नेतृत्व स्वयं किया हेमू की सेना मे 1500 युद्धक हाथी और उत्कृष्ट तोपखाने से सुसज्जित थी हेमू की पिछली सफलता ने उसे स्वाभिमान से भर दिया था 30000 की प्रशिक्षित राजपूत सेना और अफगान अश्वारोही के साथ उत्कृष्ट क्रम से आगे बढ़ा, युद्ध मे कोहराम मच गया मुगल सेना मे भगदड़ मच गयी, हेमू के तीन पत्नियाँ थी उसमे एक मुस्लिम थी वह युद्ध के समय हेमू के साथ थी उसने हेमू को धोखा दिया, धोखे से किसी का बाण हेमचंद विक्रमादित्य की आँख मे लगा फिर क्या था ! पाँसा पलट गया वह पराजित हुआ और गिरफ्तार कर अकबर का जालिम सलाहकार बैरम खान ने इस्लाम काबुल करने कलमा पढ़ने को मजबूर किया इस्लाम नहीं स्वीकार करने पर उसका सिर काटने का आदेश दिया किसी भी मुगल सैनिक की हिम्मत नहीं थी कि इस हिन्दू सम्राट का सिर काट सके, अंत मे हेमचन्द विक्रमादित्य का सिर काटकर काबुल के दिल्ली दरवाजे पर प्रदर्शन हेतु लगाया गया, उनका धड़ दिल्ली के पुराने किले मे लटकाकर हिन्दुओ को डराया दहसत पैदा करने का काम किया, हेमू की रानी अपने खजाने के साथ गायब हो गयी वह पकड़ी नहीं गयी, उनके अस्सी वर्षीय पिता पुरनदास को गिरफ्तार कर इस्लाम काबुल करने को कहा अस्वीकार करने पर उनकी हत्या कर दी, दिल्ली मे हिन्दू समाज से प्रतिशोध व हिन्दू समाज को भयाक्रान्त करने हेतु हिन्दुओं का समूहिक नर संहार  कराया गया, 1556 के पानीपत के दूसरे युद्ध की विजय ने वास्तविक मुगल सत्ता को स्थापित कर दिया, बंगाल तक का सारा का सारा क्षेत्र हेमू के अधिकार मे था अकबर को उसे अधिकार मे लेने हेतु आठ वर्ष लग गया हेमू का जन्म दिल्ली के एक गाव 1501 मे हुआ था 1556 मे वे वीरगति को प्राप्त हुए कई इतिहास कारों ने उसे भारत का नैपोलियन कहा ।               
         1555 ईस्वी में जब मुगल सम्राट हूमायूं की मृत्यु हुई थी उस समय वो मिर्जापुर चुनार के किले पर था वहीं से वो मुगलों को भारत भूमि से खदेड़ने की प्रबल इक्षाशक्ति से सेना लेकर ग्वालियर के रास्ते दिल्ली चल पड़े कई युद्धों को जीतते हुए आगरा पर हमला कर दिया हेमू का कालपी और आगरा प्रान्तों पर नियंत्रण हो गया अपनी स्थिति मजबूत करने हेतु उन्होने हिंदुओं को अपनी सेना भर्ती करना शुरू कर दिया धीरे-धीरे मुस्लिम सेना नायकों को हटा राजपूत साने नायकों की भर्ती कर अपनी स्थिति मजबूत कर मुगलों को पराजित किया, 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुये, दिल्ली के पुराने किले मे 350 वर्ष पश्चात पूर्ण वैदिक रीति से एक हिन्दू सम्राट का राज्याभिषेक होते एक बार पुनः लोगों ने देखा। 
         अगर पानीपत के द्वितीय युद्ध में छल से प्रतापी सम्राट हेमू नहीं मारे जाते तो आज भारत का इतिहास कुछ और होता मगर हमारी बदनसीबी है कि हमें अपने इतिहास का न तो कुछ पता है न ही उसके बारे में कुछ जानने में का कोई प्रयास करते हैं आज बिदेशी आक्रांता मुगलों के नाम से सड़कें मिल जाएगी उनके मकबरे, मजारें सुरक्षित मिल जाएगी समय-समय पर उनकी साफ सफाई होती है, आज समय की आवस्यकता है की हेमचन्द विक्रमादित्य, उस सम्राट की हवेली जो रेवाड़ी के कुतुबपुर मुहल्ले में स्थित हैं उसे उचित सम्मान मिलना चाहिए और ऐसे महान पराक्रमी हिन्दू सम्राट के चरित्र को अपने पाठ्यक्रम मे सामील कर अपने भारतीय बच्चो को ऐसे गौरव शाली इतिहास को पढ़ना चाहिए, आज के सेकुलर -वामपंथी दोगले इतिहासकार तो हेमू को यथोचित स्थान देने से रहे इसलिये आखिरी हिंदू सम्राट 'हेमचंद विक्रमादित्य' के बारे में खुद भी पढ़ने जानने की आवस्यकता है।
          हिन्दू सम्राट हेमचंद विक्रमादित्य भारत की वह धारा हैं जो सम्राट चन्द्र गुप्त से शुरू होकर बाप्पा रावल, राणा सांगा, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, क्षत्रपति शिवाजी तक आती है इस भारतीय स्वर्णिम इतिहास को समाप्त करने का प्रयत्न किया जा रहा है, लेकिन वे हमे हमेशा याद आएगे वह वीर राजपूत की तलवार पराई तलवार जो हेमचन्द विक्रमादित्य के प्रेरणा श्रोत बनी आज की भी हिन्दू समाज की स्थिति वैसी ही है जिस समय हेमू ने उस पराई तलवार को लेकर प्रतिज्ञा की थी, वही तलवार कभी स्वामी दयानन्द बनकर हिन्दू रक्षार्थ भारत भूमि पर आई तो कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनकर इस धरा पर आई, महान हिन्दू सम्राट हेमचन्द विक्रमादित्य का बलिदान हमेशा प्रेरणा बनकर प्रत्येक हिन्दू को प्रेरित करता रहेगा।

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

"आर्य समाज" समय की आवश्यकता ------!

"आर्य समाज" समय की आवश्यकता ------!

  आर्य समाज क्यों ---?

       भगवान कृष्ण गीता मे कहते हैं "यदा-यदाहि धर्मस्य ----- जब-जब धर्म की हानी होती है मै आता हूँ, धर्म संस्थापनार्थाय सांभावामि यूगे-यूगे---! धर्म की स्थापना हेतु ---- और वे आए बौद्ध काल मे आदि शंकर के रूप मे और वे आए ब्रिटिश काल मे ऋषि दयानन्द सरस्वती के रूप मे उन्होने देखा कि अवतारवाद की धारणा और समाज मे बिकृत पाखंड ने हिन्दू समाज को कायर बना दिया, स्वामी जी ने पूरे देश मे घूम-घूम कर अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के क्रांति का बिगुल बजवा दिया वह क्रांति असफल हुई स्वामी जी को लगा यह कैसे हुआ उन्हे ध्यान मे आया कि इसमे ब्रंहासमाज जो चर्च के इशारे पर काम कर रहा है स्वामी जी सीधे कलकत्ता ब्रह्मासमाज के मुख्यालय पहुच गए, ब्रह्म समाज के अध्यक्ष 'केशवचंद सेन' से भेट के पश्चात एक सभा मे स्वामीजी स्वराज्य की बात की  उनका दृढ़ मत था बिना स्वराज्य के स्वधर्म बेमानी है, यह समाचार वायसराय के पास पहुचा उसने स्वामी जी के दर्शन की इक्षा प्रकट की गाड़ी भेजा पहली ही भेट मे उसके पुछने पर स्वामी जी ने स्वराज्य यानी अंग्रेजों के शासन को समाप्त करना सीधे 'वायस राय' से कहना यह स्वामी दयानन्द सरस्वती ही कह सकते थे।
सब प्रश्नो का उत्तर एक-----!
          18वीं और 19वीं सदी का समय ऐसा था कि हिंदू जाती अपना स्वाभिमान खो बैठी थी, आए दिन ईसाई और मुसलमान विधर्मियों के द्वारा सदा ही हिंदूओं की आस्थाओं पर आक्रमण होते रहते थे, जैसे गाँव के कमजोर ब्यक्ति की पत्नी पूरे गाँव की भाभी और ताकतवर ब्यक्ति की पत्नी गाँव भर की बहन हो जाती है, वैसे ही हिन्दू सनातन धर्म हो गया था इस्लाम और ईसाई मतावलंबियों ने एक से एक अश्लील पुस्तकें महापुरुषों और देवी देवताओं पर आए दिन लिखते रहते थे, हिंदूओं को नीचा दिखाना इन विधर्मियों का जैसे शौंक ही हो गया था, उस समय में इनको कोई आचार्य, माधवाचार्य, शंकराचार्य, धर्माचार्य अथवा कोई पीठाधीश्वर ने उत्तर देने का साहस नहीं किया, इन तथा-कथित धर्म के उदारवाद जिसको कायरता समझ विधर्मियों का उत्साह बढ़ता ही गया और हिंदू युवा भी विधर्मियों के द्वारा किए इन आक्षेपों के उत्तर इन धर्माचारियों से यथावत न पाकर धड़ल्ले से ईसाई, मुसलमान और नास्तिक होते जाते थे, ऐसी विकट परिस्थित में ईश्वर के प्यारे आर्यपुत्र देव दयानन्द सरस्वती ने अंगड़ाई भरी और सर्व प्रथम "सत्यार्थ प्रकाश" नामक उत्तम अमर ग्रंथ लिखकर 13वें और 14वें 'समुल्लास' में ईसाईयत और इस्लाम का खुल्ला खंडन देखकर तिलमिला उठे और तब से विधर्मियों को मूँह तोड़ उत्तर देने का सिलसिला 'आर्य समाज' के द्वारा चल पड़ा । 
आर्य समाज द्वारा मुह तोड़ जबाब------
            विधर्मियों के द्वारा ये निम्नलिखित पुस्तकें बहुत प्रचलित थीं :- • रंगीला कृष्ण • रहबरे दकन • रद्दे हिंदू  • कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी ऐसे अनेकों अश्लील और घृणात्मक पुस्तकें समय समय पर हिंदूओं को तोड़ने और नीचा दिखाने के लिए लिखी जाती रहीं, जिसका उत्तर आर्य समाजियों ने समय- समय पर देना शुरू किया, जैसे- योगेश्वर कृष्ण • हुज्जतुल इस्लाम • रद्दे इस्लाम • गीता गौरव  ऐसी अनेकों पुस्तकें प्रत्युत्तर में लिखीं और इन विधर्मियों का दिमाग ठीक करने के लिए इनके चरित्रहीन पैगम्बरों की पूरी पोल समय -समय पर आर्य समाजी खोलते रहे, एक ऐसी ही अश्लील पुस्तक मुसलमानों ने माता सीता जी के  पतिव्रता और पवित्रता की साक्षात मूरत के बारे में लिखी थी जिसका नाम था "सीता का छिनाला" । इस पुस्तक का प्रत्युत्तर देने के लिए कोई पंडा या पुरोहित या अपने आप को धर्म का ठेकेदार बोलने वाला आचार्य नहीं आया, तभी 7 भाषाओं के विद्वान आर्य समाज के धुरंधर सैनानी 'पंडित चमूपति जी' ने ही इसका उत्तर 'रंगीली रसूल' नामक पुस्तक लिखकर मुहम्मद की गंदगी और उसकी औरतखोरी की सारी पोल खोल दी, और ये ऐसा मूँहतोड़ उत्तर था कि विधर्मियों की रातों की नींद उड़ गई थी, ठीक इसी प्रकार से सैंकड़ो खंडनात्मक पुस्तकें लिखकर इन विधर्मियों का दिमाग ठिकाने पर केवल आर्य समाज ने ही लगाया हुआ है, राष्ट्र कबि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' मे सत्य ही लिखा है की आर्य समाज हिन्दू समाज का क्षत्रित्व गुण है ।
         जिस प्रकार बौद्ध काल मे स्वामी शंकरचार्य आए उन्होने डूबते हुए हिन्दू सनातन धर्म को पुनः उसकी सार्थकता सिद्ध की उसी प्रकार स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इस्लामिक व ब्रिटिश काल मे परिसकृत जीवंत हिन्दू दर्शन देने का काम किया आर्य समाज द्वारा तैयार किए हुए लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चांदपाल हो अथवा स्यमजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर रहे हों या नेताजी सुभाष चंद बोष- हुतात्मा भगत सिंह सभी ने शंकरचार्य की राष्ट्रवादी धारा को आगे बढ़ाया, ध्यान देने योग्य बात है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा केशव बलीराम ने भी इसी धारा इसी चिंतन और इन महापुरुषों के  चिंतन का परिमार्जित रूप ही हेड्गेवार का संघ है, जिसको यानी इस विचार केवल बढ़ाया ही नहीं तो आज सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय महापुरुषों की वैचारिक विजय पताका फहरा रहा है, दूसरी तरफ स्वामी दयानन्द ने विधर्मी हुए हिन्दू समाज को वापस अपने हिन्दू धर्म आने का दरवाजा खोल दिया जिस कार्य को शंकरचार्य ने 3000 वर्ष पूर्व किया था उसे स्वामी जी ने ब्रिटिश काल मे आरंभ केआर नयी क्रांति पैदा कर दी, स्वामी श्रद्धानंद ने इसी कार्य को आगे बढ़ते हुए मेरठ से गाजियावाद तक के 111 गावों के बिधर्मी हुए लोगो की घर वापसी की इतना ही नहीं राजस्थान के 'मलकाना राजपूतों' की 'सवा लाख' की घर वापसी स्वामी जी को भरी पड़ी जिसमे उनकी जन चली गयी आज भी स्वामी श्रद्धानंद जी आदर्शों पर चलकर धर्म जागरण तथा आर्य समाज सहित बहुत सारे संगठन यह कार्य कर रहे हैं जिसका वास्तविक प्रेरणा श्रोत वास्तव मे आर्यसमाज की ही है ।     
 स्वामी दयानन्द सरस्वती और प्रो० मैक्समूलर:-
(1) स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन चरित्र में मैक्समूलर के सम्बन्ध में उल्लेख पाया जाता है । जैसे कि – मैक्समूलर के वैदिक ज्ञान की चर्चा चलने पर स्वामी जी ने बताया कि "यह जर्मन् विद्वान् (मैक्समूलर) इस (वैदिक ज्ञान के) क्षेत्र में तो अभी बालक ही है, जब तक वेदों का कोई पारगामी विद्वान् उसका गुरु बन कर बोध नहीं करायेगा, तब तक वेदार्थ में वह पूर्ण नहीं हो सकता --? (सन्दर्भ ग्रन्थ : ‘नवजागरण का पुरोधा दयानन्द सरस्वती’, लेखक : डॉ० भवानीलाल भारतीय, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 319)
(2) सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में भी स्वामी जी ने मैक्समूलर के वेदार्थ सम्बन्धी ज्ञान के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा है - "जो लोग कहते हैं कि - जर्मनी देश में संस्कृत विद्या का बहुत प्रचार है और जितना संस्कृत मोक्षमूलर साहब पढ़े हैं उतना कोई नहीं पढ़ा, यह बात कहने मात्र है क्योंकि "यस्मिन्देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते’' अर्थात् जिस देश में कोई वृक्ष नहीं होता उस देश में एरण्ड ही को बड़ा वृक्ष मान लेते हैं, वैसे ही यूरोप देश में संस्कृत विद्या का प्रचार न होने से जर्मन लोगों और मोक्षमूलर साहब ने थोड़ा-सा पढ़ा वही उस देश के लिये अधिक है। परन्तु आर्यावर्त्त देश की ओर देखें तो उनकी बहुत न्यून गणना है । क्योंकि मैंने जर्मनी देशनिवासी के एक प्रिन्सिपल के पत्र से जाना कि जर्मनी देश में संस्कृत चिट्ठी का अर्थ करने वाले भी बहुत कम हैं और मोक्षमूलर साहब के संस्कृत साहित्य और थोड़ी-बहुत वेद की व्याख्या देखकर मुझको विदित होता है कि मोक्षमूलर साहब ने इधर उधर आर्यावर्त्तीय लोगों की की हुई टीका देखकर कुछ -कुछ यथा तथा लिखा है। 
"विश्व बिख्यात वैदिक विद्वान 'डेविड फ्राली' (वामदेव शास्त्री) कहते हैं कि वेदों को समझने के लिए भारतीय मन की अवस्यकता है"।
                                              ------ ओम ------

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

आध्यात्मिक (इस्लाम,चर्च ) आक्रमण और भारत -----------!

आध्यात्मिक (इस्लाम,चर्च ) आक्रमण और भारत -----------!

        

       
            किसी कवि ने कहा था --- ''यूनान, मिश्र, रोमा सब मिट गए जहां से, कुछ बात है की हसी नहीं हमारी--!'' तो वह हस्ती क्या है ? वास्तविकता यह है की भारतीय बांगमय वेद, वेदान्त, ब्राह्मण ग्रंथ, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ जिंहोने हमे लाखों नहीं करोणों ही नहीं अरबों वर्ष तक मानवीय संस्कृति की रक्षा करते हुए हमारी रक्षा की है। 
        सत्य ---"मानवता" --------
           प्रथम ईश्वर को नमस्कार और प्रार्थना करते हुए वेदों के उत्पत्ति के बारे मे कि वेद किसने उत्पन्न किए ! ( तस्मात यज्ञात्स 0) सत जिसका कभी नाश नहीं होता, चित जो सदा ज्ञान स्वरूप है, जिसको अज्ञान का लेश भी कभी नहीं होता, आनंद जो सुख स्वरूप और सबको सुख देने वाला है,इत्यादि लक्षणो  से युक्त पुरुष जो सब जगह परिपूर्ण हो रहा है, जो सब मनुष्यों को उपासना के योग्य इष्टदेव और सब सामर्थ्य से युक्त है, उसी परब्रह्मा से ( ऋच ) ऋग्वेद (यजु ) यजुर्वेद (समानी) सामवेद और (छंदासी) इस शब्द से अथर्व भी ये चरो वेद उत्पन्न हुए है। इसलिए मनुष्यों को उचित है कि वेदों का ग्रहण करें।     
         जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर है उसी से चारो वेद उत्पन्न हुए हैं, इसी प्रकार रूपकालंकार से वेदो की  उत्पत्ति का प्रकाश ईश्वर करता है,- अथर्वेद मेरे मुखसे समतुल्य सामवेद लोमों के समान यजुर्वेद हृदय के समान और ऋग्वेद प्राण का वायु है। ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी पंडिता पत्नी को उपदेश करते हैं--- हे मैत्रेयी --! जो आकाशादि से भी बड़ा सर्वव्यापक परमेश्वर है, उससे ही ऋक, यजु, साम और अथर्व ये चरो वेद उत्पन्न हुए हैं जैसे मनुष्य के शरीर से श्वास बाहर को आके फिर भीतर को जाता है इसी प्रकार सृष्टि आदि मे ईश्वर वेदों को उत्पन्न करके संसार मे प्रकाश करते है और प्रलय मे संसार मे वेद नहीं रहते, वही बृक्षरूप होके फिर भी बीज के भीतर रहता है, इसी प्रकार वेद भी ईश्वर के ज्ञान मे सब दिन बने रहते है इसलिए इसको नित्य ही जानना, उनका नाश कभी नहीं होता।    
          जिस समाज के पास विश्व का महानतम ज्ञान भंडार हो जिनके रॉम-रॉम मे आध्यात्मिक जींस जिसमे केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी ही नहीं तो वनस्पतियों का भी चिंतन किया गया हो अतिथि देवोभव का लाभ उठाकर तथा हम जैसे हैं ये लोग भी ऐसे ही होंगे लेकिन ये तो कुछ और ही निकले इस्लाम और ईसाईयत जहां- जहां गए वहाँ कि मानवातावादी संस्कृति को समाप्त कर वहाँ के लोगो को गुलाम ही बनाया, पहले भी कई बार चीनी सम्राटों ने वेटिकन के मिशनरियों को चीन से बाहर का रास्ता दिखाया था, फिर माओत्से तुंग ने 1949 मे सत्ता प्रपट करते ही पुनः विदेशी मिशनरियों को "आध्यात्मिक आक्रमणकारी" कह कर चीन से बाहर किया। चीनी सत्ता को अपने देश के इसाइयों पर रोमन चर्च का हुक्म चलना गवारा नहीं, इसे वह चीन के अंदरूनी मामले मे हस्ताक्षेप मानता है ।
          ईसाईयत -----
         दुर्भाग्यवश भारतीय संविधान मे भी ( सेकुलर ) धर्म और रिलीजन का अभेद कर "रिलीजियस फ़्रीडम", जिसका घटक फल हुआ कि छल-बल पूर्बक किसी का मतांतरण करने जैसा अधर्म भी रिलीजियस कार्य के रूप मे स्वीकृत है ! इसीलिए आए दिन लव -जेहाद और ईसाई मिशनरियों आत्माओं कि फसल काटना कोई गैर कानूनी मामला नहीं बनाता है।
      पोप ने विश्व के तमाम चर्च के कुकृत्यों हेतु क्षमा याचना की है मगर भारत मे नहीं, जबकि ब्रिटिश लेखक पाल विलियम रोवर्ट ने अपनी पुस्तक 'एंपायर आफ द सोल सम जरनीज़ इन इंडिया' मे लिखा है -- "बच्चों पर कोड़े बरसाए गए, धीरे-धीरे उनके अंग काटे गए, उनके माता-पिता की पलकें काट कर अलग कर दी गईं, ताकी वे सब कुछ देखते रहें, कुछ न छूटे, बच्चों का अंग-भंग इस तरह किया गया कि वे तब भी चेतन हीन न हों, जब तक सिर्फ धड़ और सिर बच गया हो --।" गोवा मे आज भी हथकटवा खंभा मौजूद है जिसमे हजारों महियाओं के हाथ काटे गए थे, ऐसे अत्याचार के शिकार लोगों की संख्या हजारों मे थी, यह भयावह अत्याचार की क्षृंखला लगातार चलती रही। मगर भारत मे किए गए लोमहर्षक अत्याचारों के लिए पोप को क्षमा याचना करने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
          गांधीजी ने सत्तर साल पहले कहा था कि मिशनरियों के लिए सेवा का अर्थ वही है जो एक शिकारी अपने शिकार हेतु चारे का होता है, वास्तविक हाल देखना हो तो अफ्रीका, लैटिन अमेरिका या फिलीपींस को देखे, जहां पूरी आवादी ईसाई बना दी गयी है क्या वहाँ अशिक्षा, बीमारी समाप्त गयी --! बिलकुल नहीं। वे मिशनरी अब वहाँ नहीं, जिंहोने पूरे देशों, महाद्वीपों को साम-दाम दंड-भेद से धर्मांतरित किया, वहाँ काम पूरा हुआ तो वे कहीं और "आत्माओं का फसल काटने चल पड़े'' यदि हम इस बुनियादी सच्चाई को नहीं समझते तो एक राष्ट्र के रूप मे हमारे भविष्य पर खतरा बना रहेगा।
           ज़ोर जबर्दस्ती और लोभ द्वारा धर्मांतरण करने बिरुद्ध जयललिता ने कुछ वर्ष पहले एक कानून बनाया था, ध्यान मे आता है तब भी चर्च के लोगो ने उन कानूनों को चुनौती दी थी तब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कानून बिलकुल ठीक है कोर्ट यहाँ तक कहा "धर्म प्रचार के अधिकार का मतलब धर्मांतरण कराने का अधिकार नहीं समझा जाना चाहिए"। दुर्भाग्य से यह हम नहीं समझ पाये हैं- ईसाई मिशनरियों के लिए धर्म प्रचार का मतलब येन-केन-प्रकारेण धर्मांतरण कराने के अलावा कुछ भी नहीं, फिर भी यदि कांग्रेस पार्टी ने तमिलनाडु मे इस कानून का बिरोध किया जो देश व समाज के विरुद्ध है उसने अपने कर्तब्य का पालन ही किया है क्योंकि इसके संस्थापक भी भारत को ईसाई देश बनाना, अँग्रेजी राज चाहते थे और आज उसके अध्यक्ष सोनिया भी ।
          धर्मांतरण का कार्य 2000 वर्षों से चल रहा है यह प्रत्येक ईसाई का कर्तब्य वन जाता है  इसके लिए एक अति विशाल संगठन खड़ा किया गया है और आत्माओं के उद्धार के लिए विशाल संसाधन लगाए जा रहे हैं सुसमाचार-प्रचार पर एक पुस्तक के अनुसार, "वैश्विक ईसाइयत के संचालन के लिए 145 अरब डालर की  जरूरत है"। चर्च के अधीन चालीस लाख पूर्ण कालिक कार्यकर्ता हैं, तेरह हज़ार बड़े पुस्तकालयों का संचालन करता है, 22000 पत्रिकाएँ निकलता है, प्रति वर्ष चार अरब पुस्तिकाएँ प्रकाशित करता है, 1800 ईसाई रेडियो एवं टीवी स्टेशनों का परिचालन करता है, 1500 विश्व विद्यालय तथा 930 शोध केंद्र चलता है, इनके पास ढाई लाख विदेशी मिशनरियाँ है और इन्हे प्रशिक्षण हेतु 400 से अधिक संस्थाएं, ये सारे आकडे 1989 मे प्रकाशित एक पुस्तक लिए गए हैं ।
          संगठित समाज से आए भारतीय मिशनरियों कि संख्या 1943 मे जहां 420 थी वह 1983 मे बढ़कर 2941 हो गयी, उत्तर भारत मे विशेषकर बिहार, उड़ीसा, प बंगाल, असम, हिमांचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और सिक्किम मे इन मिशनरियों की उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है, पश्चिम भारत मे देशी मिशनरी प्रयासों से प्रति सप्ताह नए-नए पूजा समूह तैयार हो रहे हैं, भारतीय सुसमाचारकों की टोली ने वर्ष 2000 तक दो हज़ार गिरजा घरों का लक्ष्य रखा है अकेले तमिलनाडु मे एक हज़ार चर्च बनाने का लक्ष्य है, क्या इसे पढ़कर यह नहीं लगता कि ये लक्ष्य पेंटागन ( अमेरिकी प्रति रक्षा विभाग) का नहीं भी तो योजना आयोग का लक्ष्य तो जरूर है --! लेकिन ये इसा मशीह के लक्ष्य तो कदापि नहीं हो सकते।
          इस्लाम का प्रेम------                                    

          सकड़ों वर्षों से प्रेम मुहब्बत बताने वाला इस्लाम जिसने भारतियों के उदारता का लाभ उठाकर जिसे सूफी कहा जाता है उन्होने सर्वाधिक धर्मांतरण कराया, डॉ अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था -- जिसे सदैव याद रखने की जरूरत है- कि मुस्लिम राजनीति विशुद्ध रूप से मजहबी राजनीति है, जिसमे दूसरों से बिलगाव और विरोध मूल स्वर है, यह सबके साथ मिलकर रहने, आगे बढ़ने कि प्रवृत्ति ही खत्म करता है। यही कारण है किसी मुस्लिम को कततारपंथी कहकर स्वयं दूसरे मुस्लिम नेता या उलेमा अपने से अलग नहीं करते, वे तसलीमा को बिलग करते हैं मगर ओसामा को नहीं! वे सलमान रुशदी पर आक्रोसित होते हैं , बोको हराम पर नहीं! यह सत्य किसको दिखाई नहीं देता। फतवा जारी होता है जो उदार इस्लाम को मानते हैं जैसे सलमान रुशदी, तसलीमा नशरीन लेकिन उनका फतवा ओसामा, मुहम्मद अफजल, बगदादी आदि के खिलाफ नहीं होता, इसलिए उदारवादी और कट्टरवादी इस्लाम मे फर्क करना केवल चालाकी पूर्ण राजनीति है। किसी भी इस्लामिक आतंकवादी संगठन व ब्यक्ति के ऊपर इस्लामी अदालतों मे मुकदमा चले तो उन्हे गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वे कोई ऐसा कम नहीं कर रहे हैं जिसकी इस्लामिक किताबों, परंपरा, इतिहास मे कहीं न कहीं स्वीकृति नहीं मिली हुई है, पैगम्बर द्वारा किए गए सभी कार्य प्रत्येक मुसलमान के लिए अनुकरणीय है, ऐसी स्थित मे कोई भी इस्लामी अदालत कट्टरपंथियों को कैसे दोषी ठहरा सकती है--! उनके लिए मानवता का अर्थ 'इस्लामी मानवीयता' है, समानता का मतलब 'इस्लामी अनुयायियों की समानता' और कानून केवल 'इस्लामी कानून' है।
          आतंकवाद का कारण------ एक हदीस इस प्रकार है ''मुझे लोगों के खिलाफ तब-तक लड़ते रहने का आदेश मिला है, कि जब तक वे ये गवाही न दें कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा कबिले इबादत नहीं है और मुहम्मद अल्लाह का रसूल है और तब तक वे नमाज न अपनाएं और जकात न अदा करें । (सहीह मुस्लिम, हदीस -33)    
          मीडिया का कैसा दोहरा चरित्र है जहां योगी आदित्यनाथ की चेतावनी की पुष्टी होती है वहीं मीडिया योगी जी के बयानों को लेकर बवंडर खड़ा करती है वहीं जवाहिरी की घोषणा को आया राम -गया राम बताने की कोशिस की गयी, अधिकांश इस्लामिक निर्देश ऐसे हैं जिसमे कोई बिवाद नहीं है, जैसे पैगम्बर के बिरोध करने वाले को मार डालना, इसकी पुष्टी न केवल पैगम्बर के अपने जीवन ब्यवहार से होती है बल्कि अनगिनत इस्लामी आलिमों, अदालती फैसलों की पूरी सूची है, यह मजहब आर्य- समाजियों को, नगीब महफूज, सलमान रुशदी, सलाम आज़ाद जैसे लेखकों पत्रकारों इत्यादि को मार डालने का निर्देश देता है। सच्चे इस्लाम की दुहाई देने, मधुर बातें करने वाले तालिबानों, हमास, अल कायदा, इंडियन मुजाहिद्दीन, इस्लामी स्टेट, बोको हराम, आदि के हजारों लाखों कार्यकर्ताओं समर्थकों कायल क्यों नहीं करती --? जबकि ये भी उसी इस्लाम का हवाला देते हैं तो क्या उनके वैचारिक श्रोत उससे भिन्न हैं जो हमारे गाँधीवादियों, सेकुलरवादियों के हैं --?        
             दुर्भाग्यवस विगत सौ वर्ष के इतिहास का अनुभव आस्वस्तकारी नहीं है, खिलाफत, जेहाद को लेकर आक्रमण हेतु अफगानिस्तान को न्योता देने और फिर 'डायरेक्ट एक्शन' कर हजारों हिंदुओं को निर्ममता से बिना कारण मारते हुए भारत का विभाजन तक, पुनः 1971 मे बांग्लादेश मे हिन्दू संहार से लेकर कश्मीर से हिंदुओं के सफाये गोधरा जैसे हिन्दू -दहन तक, यह सब कई बार देखा जा चुका है कि आम मुस्लिम समुदाय कट्टरपंथियों के समक्ष मौन समर्थक बना हुआ है।तलवार के घमंड के वावजूद इस्लाम को अपनी वैचारिकता दुर्बलता की इतनी गहरी अनुभूति है कि बिना मौत का डर दिखाये  वह अपने अनुयायियों के भी इस्लाम मे बने रहने के प्रति आस्वस्थ नहीं है, तभी तो इस्लामी नेता किसी भी बात पर उनका सिर काटने की धमकी देते रहते हैं।  
           उपाय ------
           दुनिया के मुसलमान अपने मजहब के रजिस्टर्ड कैदी हैं ! इस्लाम एक जेल है जिसमे उन्हे जेल के नियमों से रहना होगा, जहां वे अपनी समझ से कुछ नहीं कर सकते, उस जेल को छोड़ भी नहीं सकते, वरना उन्हे मार डाला जाएगा , ठीक उसी प्रकार जैसे जेल से भागे हुए कैदी को जेल की चहर-दिवाली की रक्षा करने वाले सिपाही गोली मार देते हैं, इससे बढ़कर इस्लामी मतवाद की अनुपयोगिता, निरर्थकता का और क्या प्रमाण होगा ! इसी सत्या को समझ हरेक मुसलमान इस्लाम का कैदी है और उसे मुक्त होना अथवा उसे मुक्त करना मानवता का फर्ज और सबसे बड़ी सेवा है। जैसे चर्च की सदियों पुरानी ज़ोर-जबर्दस्ती ईसाई जनता ने अंततः अस्वीकार कर दी, उसी तरह इस्लामी मौत के फतवे और शरीय के कानून को छोड़ा ही जाएगा। 1924 मे तुर्की ने खालिफत को उखाड़ फेकते हुए इस्लाम को बेकार और मृत घोषित कर दिया , आज सम्पूर्ण मुस्लिम विश्व मे अतातुर्क की कारण टर्की मे ही लोकतन्त्र और प्रगति है।          
         श्री अरविंद ने आठ दशक पहले कहा था----  
         "तुम ऐसे मजहब के साथ सौहार्द के साथ रह सकते हो जिसका सिद्धान्त सहिष्णुता है, किन्तु ऐसे मझाब के साथ शांति से रहना कैसे संभव है जिस का सिद्धान्त है 'मै तुम्हें बरदास्त नहीं करूंगा !' तुम ऐसे लोगों के साथ एकता कैसे बनाओगे? निश्चय ही हिन्दू मुस्लिम एकता ऐसे नहीं बन सकती कि मुस्लिम तो हिंदुओं को धर्मांतरित कराते रहें जबकि हिन्दू किसी भी मौसिम को धर्मांतरित न करे ! संभवतः मुसलमानों को हानिरहित बनाने का एक ही रास्ता है कि उन का अपने मजहब मे कट्टर विस्वास कम कराया जाय ।"
          स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ----
         ओ अहंकारियों ! बताओ तुम्हारी ईसाईयत ने तलवार के बिना कहाँ सालता पायी-? मुझे सम्पूर्ण विश्व मे ऐसा केवल एक भी उदाहरण तो बताओ, मै दो नहीं चाहता, मै जनता हु कि तुम्हारे पूर्वजों का धर्म-परिवर्तन किस प्रकार किया गया था, मृत्यु या धर्म-परिवर्तन, उनके सामने दो ही मार्ग थे इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। अपनी समस्त दांभिक गर्जनाओं के बावजूद तुम इस्लाम से किस मामले मे श्रेष्ठ हो ? अरबों ने गर्जना कि थी "हामी श्रेष्ठ है केवल हम ही!" क्यों--? "क्योंकि हम दूसरों की हत्या कर सकते हैं ।"
        इन दोनों मजहबों ने भारत पर अध्यमिक आक्रमण किया है भारत को इससे छुटकारा पाना होगा ये सभी हमारे पूर्वजों की संताने हैं इन्हे उनकी चहार दिवाली से मुक्त कारण ही एक उपाय है इसी मे भारतीयता, मानवता का हित होगा।   
                         (संदर्भ-"भारत मे ईसाई धर्म-प्रचारतंत्र" -"आध्यात्मिक आक्रमण और घर वापसी" )        

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

एक बार फिर नए प्रकार के राजवंशों (ब्यूरोकेट) के विरुद्ध युद्ध(संघर्ष) की अवस्यकता ------!

एक बार फिर नए प्रकार के राजवंशों (ब्यूरोकेट) के विरुद्ध युद्ध(संघर्ष) की अवस्यकता ------!

            आज मुझे महर्षि दयानन्द सरस्वती की बहुत याद आ रही है वे महाभारत युद्ध मे समाप्त हुए विद्वान आचार्यों की पूर्ति करने वाले थे, जहां वे यज्ञवाल्क्य के समान विद्वान थे वहीं चाणक्य के समान राजनीतिज्ञ भी थे, उन्होने इस्लाम व ईसाइयत से संघर्षरत भारत को खड़ा करने का प्रयत्न ही नहीं किया बल्कि भारत वर्ष के राजे -महराजों सबसे मिलकर देश आज़ाद करने का संकल्प लिया, वे ऐसे गुरु के शिष्य थे 'स्वामी विरजानन्द' जो जन्मांध थे लेकिन देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी और वेदों के विद्वान थे उन्होने अपने शिष्य दयानन्द सरस्वती से शिक्षा समाप्त होने पर दक्षिणा मे देशोद्धार का वचन लिया स्वामी जी अपने वचन के खरे उतरे अपने गुरु के आदेश के पालन हेतु देश का भ्रमण कर तत्कालीन राजा-महाराजाओं से मिलकर 1857 की क्रांति का सफल उद्घोग किया, कुछ लोग कहते हैं की यह असफल क्रांति थी लेकिन यह एक सफल क्रांति थी जिससे हिन्दुत्व व आज़ादी की चिंगारी देशभर मे फैल गयी --।
          1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के पश्चात अंग्रेजों ने देखा की गाँव-गाँव मे गुरुकुल है जिनके कारण पूरा देश खड़ा हो गया फिर 1857 से लेकर 1860 तक पूरे देश मे ब्रिटिश ने अपनी सत्ता को जमाने हेतु जीतने राजा थे पढे-लिखे लोग थे गाव-गाँव मे जो गुरुकुल थे सभी समाप्त करना अंग्रेजों ने अपना कर्तब्य समझा एक आकड़े के अनुसार केवल उत्तर प्रदेश आैर बिहार मे लगभग 20 लाख हिंदुओं की हत्या हुई आज भी कितने गाँव मिलते हैं जहां कुएं लासों से पटे थे, कितने पीपल के पेड़ों मे फांसी पर सैकड़ों हजारों को लटकाया गया जनता मे भय ब्याप्त हो गया इस प्रकार पुराने देश भक्त राजाओं को समाप्त कर दिया गया फिर क्या था, अंग्रेजों को पता था भारत मे साधू-संतों के प्रति जनता मे आस्था है यदि हमने साधुओं को छेड़ा तो भारी पड़ सकता है बड़ी ही योजना अनुसार एक अँग्रेजी पढे लिखे ब्यक्ति को साधू बनाकर कलकत्ता मे उतार दिया जो अंग्रेजों का सहायक सिद्ध हुआ वह पूरे भारत मे घूम-घूम कर अंग्रेज़ देवदूत है इसका प्रचार करता था जिसका नाम था राजा राममोहन राय जिसने ब्रम्ह्समाज नामक संस्था बनाया था जो ईसाइयत और सनातन धर्म मे पुल का काम करता था जिसे कंपनी द्वारा सहायता प्राप्त था, ब्रम्हा समाज का उद्देश्य था की भारत मे अंग्रेजों का शासन बना रहे और लोंगों को ईसाइ बनाना अथवा चर्च की तरफ आकर्षित करना मानसिक, गुलाम बनाना अंग्रेजों ने पुराने राजाओं को समाप्त कर नए राजा, महाराजा, तालुकेदार, जमींदार खड़े किए क्योंकि शासन चलाने के लिए एक पद्धति की आस्यकता थी वह राजा पद्धति जो भारत की जनता मे श्रद्धा के केंद्र विंदु थे लेकिन वे अंग्रेज़ भक्त थे न कि देश भक्त अथवा स्वतन्त्रता के प्रेमी। ब्रम्हा समाज और कुछ पुराने ब्रिटिश अधिकारी जो यह चाहते थे कि यहाँ लंबे समय तक अंग्रेजों का शासन रहना चाहिए उन्होने मिलकर कांग्रेश पार्टी नाम का एक संगठन खड़ा किया पहले जिसमे ब्रांहासमाजी, भारतीय ईसाई इस प्रकार के लोगों को सामिल किया जाता था जो चर्च से गाइड होता था उस समय किसी भी आर्यसमाजी को कांग्रेश के किसी कार्यक्रम मे बुलाया नहीं जाता था, एक प्रकार से कांग्रेश ब्रिटिश सरकार के शासन को भारत मे स्थायी करने वाली संस्था के रूप मे जानी जाती थी।        
           स्वामी दयानन्द द्वारा 1857 कि क्रांति सफल न होने के कारण उन्होने संगठित हिन्दू समाज पर बल दिया देश मे घूम-घूम कर देश भक्ति और स्वराज्य का अभियान शुरू किया वे इस दौरान कलकत्ता गए और ब्रम्हा समाज के कार्यालय मे ही ठहरे वे जानते थे कि "ब्रम्हा समाज" का उदेश्य क्या है ? उनके प्रवचन से ब्रंहासमाजियों को परेशानी होने लगी तभी एक दिन वायसराय के यहाँ से स्वामी जी का बुलावा आ गया कि वायसराय मिलना चाहते हैं स्वामी जी गए वार्ता मे वायसराय ने पूछा कि स्वामीजी आपका उद्देश्य क्या है स्वामीजी ने उत्तर दिया कि स्वराज्य और स्वधर्म और स्पष्ट कर स्वामीजी ने बताया कि वे स्वराज्य की स्थापना करना और ब्रिटिस शासन को उखाड़ फेकना वायसराय को यह अच्छा नहीं लगा जहां-जहां स्वामी जी जाते वहाँ उनपर सरकार निगरानी रखने लगी फिर "आर्यसमाज" की स्थापना कर स्वामीजी ने क्रांतिकारियों की श्रिंखला ही खड़ी कर दी, कहीं लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, कहीं लालालाजपत राय, कहीं बिपिंनचंद पाल खड़े हो गए तो कहीं स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने घर वापसी शुरू कर दी तो कहीं "डॉ हेड्गेवार" ने "आरएसएस" की स्थापना कर देश मे स्वधर्म और स्वराज्य की आंधी सी खड़ी कर दी ।
        1947 मे देश तो आज़ाद हो गया लेकिन स्वराज्य नहीं मिला वही ब्रिटिश सोच वही भारतीय जनता पर शासन करने वाली अंग्रेजों की नीति वही बिना किसी स्वदेशी परिवर्तन के 'आईएएस- आईपीएस' अधिकारी जनता के सेवक नहीं जनता के मालिक ऐसा विधान जनता जैसे इस्लामिक व ईसाईयत शासन मे पीड़ित थी आज नये अङ्ग्रेज़ी शासन मे उससे अधिक पीड़ित है जो जनता के वोट से सत्ता मे आते हैं वे जनता के मालिक और जिनहे आईएएस-आईपीएस व अन्य अधिकारी व्यूरोकेट हैं वे भारत के सुपर शासक हैं एक प्रकार के भारत मे नये राजवारों का उदय हो गया है वे भारत के किसी भी स्वदेशी अभियान को अच्छा नहीं मानते वे भारत को स्वावलंबी होना देखना नहीं चाहते वे वर्तमान शासक प्रधानमंत्री "नरेन्द्र मोदी" जो "स्वामी दयानन्द" के स्वराज्य डॉ हेडगेवार की स्वतन्त्रता के कल्पना का भारत बनाना चाहते हैं इन्हे पसंद नहीं प्रत्येक रास्ते मे रोड़ा बनकर खड़े हो रहे हैं ये पं जवाहरलाल नेहरू (काले अंग्रेज़) की क्षाया से स्वदेशी स्वीकार नहीं करना चाहते जिस प्रकार अंग्रेजों ने ईसाई सत्ता को मजबूत करने हेतु नये-नये राजा, तालुकेदार और जमीनदार खड़े किए जो दिखे तो भारतीय लेकिन अंग्रेज़ भक्त हों न कि भारत भक्त नेहरू जी ने भी कुछ इसी प्रकार के काले अंग्रेज़ भक्त राजाओं (आईएएस) ब्यूरोकेट खड़ा किया आज एक स्वराज्य व स्वदेश सोच कि सरकार जो जनता द्वारा चुनकर आई है उसे वरदास्त नहीं कर पा रहे हैं देश के जो भी चाहे बैंक अधिकारी, रेलवे अधिकारी अथवा प्रशासनिक अधिकारियों का समूह हो ए सभी इस जनता कि चुनी सरकार को स्वीकार नहीं कर रहे हैं वे हर मोर्चे पर लोकतान्त्रिक सरकार को पराजित करना चाहते हैं क्योंकि वे ब्रम्हा समाज, ऐ ओ हयूम द्वारा बनाई गयी ब्रिटिश सरकार को मजबूत करने वाली कांग्रेश बनाए आंग उपांग हैं इस कारण इस विषय पर विचार करने कि आवस्यकता है।      
        आज देश मे 130 वर्ष पुरानी कांग्रेश पुनः स्थापना की हालत को प्राप्त हो गयी है उस समय भी कांग्रेस को चर्च का संरक्षण था इसाइयों का ही बोल-बाला था आज भी पुनः उसका हाल वही हो गया है उसने ही इस नवीन पद्धति को पनपाया है जिसमे भारतीयता का लेश मात्र भी प्रभाव नहीं है आज नए परिवेश के अँग्रेजी राजाओं (आईएएस, आईपीएस, ब्यूरोकेट) को समाप्त करने हेतु देश किसी ऋषि दयानन्द सरस्वती का इंतजार कर रहा है !

सोमवार, 21 नवंबर 2016

जब एक चर्च मे धर्मान्तरण हेतु गये अशोक ने फ़ादर की बोलती बन्द की---!

जब एक चर्च मे धर्मान्तरण हेतु गये अशोक ने फ़ादर की बोलती बन्द की---!

चर्च में फ़ादर के साथ क्रिश्चियानिटी और हिंदुत्व पर धार्मिक बहसः----
क्रिश्चियनिटी के गाल पर हिंदुत्व का थपेड़ा----------!
          अभी कुछ महीने पहले ही नई यूनिट में ट्रान्सफर आया हूँ चूँकि पिछली यूनिट में कई लोगों ने मेरी छवि एक सांप्रदायिक कट्टर हिन्दू की बना दी थी और कुछ लोगों ने मुझे इस्लाम और क्रिश्चियनिटी विरोधी बता दिया था, सो इस यूनिट में मैं काफ़ी शाँत रहता था किसी भी धर्म पर मैं कोई भी बात नही करता था, मेरे साथ एक सीनियर हैं जो 4 साल पहले हिंदू से क्रिस्चियन में कन्वर्ट हुए हैं, वो दिन रात क्रिश्चियनिटी की प्रशंसा करते रहते और हिंदुत्व को गालियाँ देते रहते थे, चूँकि उन्हें मेरे बारे में कोई जानकारी नही थी और नाही उन्होंने मेरी हिस्ट्री पढ़ी थी। सो कल रविवार को बातों हिं बातों में उन्होंने मुझे क्रिश्चियानिटी में कन्वर्ट होने का ऑफ़र दे दिया और क्रिश्चियनिटी के फ़ायदे बताने लगे।
           मैं कई दिनों से ऐसे मौके की तलाश में था क्योंकि मेरे दिमाग में क्रिस्चियन कन्वर्शन वाले मुद्दे को लेकर बड़ा फ़ितूर चल रहा था, मैं उसके ज्ञान का लेवल जानता था मैं जानता था की उसे क्रिश्चियनिटी और बाइबिल में कुछ भी नही आता है इसलिए मैंने उससे बहस करना जायज़ नही समझा। मैं बाइबिल को लेकर बड़े क्रिस्चियन फादर से बहस करना चाहता था सो मैंने उनका ऑफ़र स्वीकार कर लिया। कल शाम को मैं अपने आठ जूनियर और उस सीनियर के साथ चर्च पहुँच गया, वहाँ कुछ परिवार भी हिन्दू से क्रिस्चियन कन्वर्शन के लिए आये हुए थे, और धर्म परिवर्तन कराने के लिए गोआ के किसी चर्च के फादर बुलाये गए थे, चर्च में प्रेयर हुई फिर उन्होंने क्रिश्चियनिटी और परमेश्वर पर लेक्चर दिया और होली वाटर के साथ धर्मान्तरण की प्रोसेस शुरू की।
            मैंने अपने सीनियर से कहा की वो फ़ादर से रिक्वेस्ट करें की सबसे पहले मुझे कन्वर्ट करें, फिर फ़ादर ने मुझे बुलाया और बोला " जीसस ने अशोक को अपनी शरण में बुलाया है मैं अशोक का क्रिश्चियनिटी में स्वागत करता हूँ" मैंने फ़ादर से कहा की मुझे कन्वर्ट करने से पहले क्रिस्चियन और हिन्दू को कम्पेयर करते हुए उसके मेरिट और डिमेरित बताएँ। मैं कन्वर्ट होने से पहले बाइबिल पर आपके साथ चर्चा करना चाहता हूँ कृपिया मुझे आधा घण्टे का समय दें और मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर दें, फ़ादर को मेरे बारे में कोई जानकारी नही थी और उन्हें अंदाजा भी नही था की मैं यहाँ अपना लक्ष्य पूरा करने आया हूँ और उन्हें पता ही नही था की मैं अपना काम अपने प्लान के मुताबिक़ कर रहा हूँ।
फादर द्वारा हिन्दू धर्म की आलोचना-----!
           उस फ़ादर को इस बात का अंदेशा भी नही था  की आज वो कितनी बड़ी आफ़त में फ़ंसने वाले हैं, सो फ़ादर बाइबिल पर चर्चा करने के लिए तैयार हो गए, 【मैंने पूछा फ़ादर " क्रिश्चियनिटी हिन्दूत्व से किस तरह बेहतर है, परमेश्वर और बाइबिल में से कौन सत्य है, अगर बाइबिल और यीशु में से एक चुनना हो तो किसको चुनें"】अब फ़ादर ने क्रिश्चियनिटी की प्रसंशा और हिंदुत्व की बुराइयाँ करनी शुरू की और कहा-----------!
1.यीशु ही एक मात्र परमेश्वर है और होली बाइबिल ही दुनियाँ में मात्र एक पवित्र क़िताब है, बाइबिल में लिखा एक एक वाक्य सत्य है वह परमेश्वर का आदेश है, परमेश्वर ने ही पृथ्वी बनाई है।
2.क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है जबकि हिन्दुओँ की किताबों में केवल अंध विश्वास है।
3.क्रिश्चियनिटी में समानता है जातिगत भेदभाव नही है जबकि हिंदुओं में जाति-प्रथा है।
4.क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुषों के बराबर सम्मान हैं जबकि हिन्दुओँ में लेडिज़ का रेस्पेक्ट नही है, हिन्दू धर्म में लेडिज़ के साथ सेक्सुअल हरासमेंट ज़्यादा है।
5.क्रिस्चियन कभी भी किसी को धर्म के नाम पर नही मारते जबकि हिन्दू  धर्म के नाम् पर लोगों को मारते हैं बलात्कार करते हैं हिन्दू बहुत अत्याचारी होते हैं।
6.हिंदुओ में नंगे बाबा घूमते हैं सबसे बेशर्म धर्म है हिन्दू।
निरुत्तर फादर-------!
 अब मैंने बोलना शुरू किया की फ़ादर मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ---------!
1. जैसा आपने कहा की परमेश्वर ने पृथ्वी बनाई है और बाईबल में एक एक वाक्य सत्य लिखा है और वह पवित्र है, तो बाईबल के अनुसार पृथ्वी की उत्त्पति ईशा के जन्म से 4004 वर्ष पहले हुई अर्थात बाइबिल के अनुसार अभी तक पृथ्वी की उम्र 6020 वर्ष हुई जबकि साइंस के अनुसार(कॉस्मोलॉजि)  पृथ्वी 4.8 बिलियन वर्ष की है जो बाइबिल में बतायी हुई वर्ष के बहुत ज़्यादा है। आप भी जानते हो साइंस ही सत्य है अर्थात बाइबिल का पहला अध्याय ही बाइबिल को झूँठा घोषित कर रहा है मतलब बाइबिल एक फ़िक्शन बुक है जो मात्र झूँठी कहानियों का संकलन है, जब बाइबिल ही असत्य है तो आपके परमेश्वर का कोई अस्तित्व ही नही बचता।
2.आपने कहा की क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है तो आपको बता दूँ की क्रिश्चियनिटी में ज्ञान नाम का कोई शब्द नही है , याद करो जब "ब्रूनो" ने कहा था की पृथ्वी सूरज की परिक्रमा लगाती है तो चर्च ने ब्रूनो को 'बाइबिल को झूंठा साबित करने के आरोप में जिन्दा जला दिया था और गैलीलियो को इसलिए अँधा कर दिया गया क्योंकि उसने कहा था 'पृथ्वी के अलावा और भी ग्रह हैं' जो बाइबिल के विरुद्ध था, अब आता हूँ हिंदुत्व में तो फ़ादर हिंदुत्व के अनुसार पृथ्वी की उम्र ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है जो लगभग 1.97 बिलियन वर्ष है जो साइंस के बताये हुए समय के बराबर है और साइंस के अनुसार  ग्रह नक्षत्र तारे और उनका परिभ्रमण हिन्दुओँ के ज्योतिष विज्ञानं पर आधारित है, हिन्दू ग्रंथो के अनुसार 9 ग्रहों की जीवन गाथा वैदिक काल में ही बता दी गयी थी। ऐसे ज्ञान देने वाले संतो को हिन्दुओँ ने भगवान के समान पूजा है नाकि जिन्दा जलाया या अँधा किया।
केवल हिन्दू धर्म ही ऐसा है जो ज्ञान और गुरु को भगवान से भी ज़्यादा पूज्य मानता है जैसे
   "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः
   गुरुर्साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरूवे नमः।।
और फ़ादर दुनियाँ में केवल हिन्दू ही ऐसा है जो कण कण में ईश्वर देखता है और ख़ुद को "अह्मब्रह्मस्मि" बोल सकता है इतनी आज़ादी केवल हिन्दू धर्म में ही हैं।
3. आपने कहा की 'क्रिश्चियनिटी में समानता है जातिगत भेदभाव नही है तो आपको बता दूँ की 
क्रिश्चियनिटी पहली शताब्दी में तीन भागों में बटी हुई थी जैसे "Jewish Christianity , Pauline Christianity, Gnostic Christianity". जो एक दूसरे के घोर विरोधी थे उनके मत भी अलग अलग थे। फिर क्रिश्चियनिटी Protestant, Catholic Eastern Orthodoxy, Lutherans में विभाजित हुई जो एक दूसरे के दुश्मन थे, जिनमें ' कुछ लोगों को मानना था की "यीशु" फिर जिन्दा हुए थे तो कुछ का मानना है की यीशु फिर जिन्दा नही हुए, और कुछ ईसाई मतों का मानना है की "यीशु को सैलिब पर लटकाया ही नही गया", कुछ का मानना है कि इशू नाम का कोई ब्यक्ति पैदा ही नहीं हुआ केवल कहानी गढ़ी गयी, आज ईसाईयत हज़ार से ज़्यादा भागों में बटी हुई है, जो पूर्णतः रँग भेद (श्वेत- अश्वेत ) और जातिगत आधारित है आज भी पुरे विश्व में कनवर्टेड क्रिस्चियन की सिर्फ़ कनवर्टेड से ही शादी होती है, आज भी अश्वेत क्रिस्चियन को ग़ुलाम समझा जाता है, फ़ादर भेदभाव में ईसाई सबसे आगे हैं हैम के वँशज के नाम पर अश्वेतों को ग़ुलाम बना रखा है।
4. आपने कहा की क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार है, तो बाईबल के प्रथम अध्याय में एक ही अपराध के लिये परमेश्वर ने 'ईव' को आदम से ज्यादा दण्ड क्यों दिया, ईव के पेट को दर्द और बच्चे जनने का श्राप क्यों दिया आदम को ये दर्द क्यों नही दिया अर्थात आपका परमेश्वर भी महिलाओं को पुरुषों के समान नही समझता।
      आपके ही बाइबिल में "लूत" ने अपनी ही दोनों बेटियों का बलात्कार किया और इब्राहीम ने अपनी पत्नी को अपनी बहन बनाकर मिस्र के फिरौन (राजा) को सैक्स के लिए दिया, आपकी ही क्रिश्चियनिटी ने पोप के कहने पर अब तक 50 लाख से ज़्यादा बेक़सूर महिलाओं को जिन्दा जला दिया। ये सारी रिपोर्ट आपकी ही बीबीसी न्यूज़ में दी हुईं हैं, आपकी ही ईसाईयत में 17वीं शताब्दी तक महिलाओं को चर्च में बोलने का अधिकार नही था, महिलाओं की जगह प्रेयर गाने के लिए भी 15 साल से छोटे लड़को को नपुंसक बना दिया जाता था उनके अंडकोष निकाल दिए जाते थे महिलाओं की जगह उन बच्चों से प्रेयर करायी जाती थी। बीबीसी के सर्वे के अनुसार सभी धर्मों के धार्मिक गुरुवों में सेक्सुअल केस में सबसे ज़्यादा "पोप और नन" ही एड्स से मरे हैं जो ईसाई ही हैं, फ़ादर क्या यही क्रिश्चियनिटी में नारी सम्मान है ?
      अब आपको हिंदुत्व में बताऊँ। दुनियाँ में केवल हिन्दू ही है जो कहता है " यत्र नारियन्ति पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहीँ देवताओं का निवास होता है,।
5. फ़ादर आपने कहा की क्रिस्चियन धर्म के नाम पर किसी को नही मारते तो आपको बता दूँ 'एक लड़का हिटलर जो कैथोलिक परिवार में जन्मा उसने जीवनभर चर्च को फॉलो किया उसने अपनी आत्मकथा "MEIN KAMPF" में लिखा ' वो परमेश्वर को मानता है और परमेश्वर के आदेश से ही उसने 10 लाख यहूदियों को मारा है' हिटलर ने हर बार कहा की वो क्रिस्चियन है। चूँकि हिटलर द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण था जिसमें सारे ईसाई देश एक दूसरे के विरुद्ध थे इसलिए आपके चर्च और पादरियों ने उसे कैथोलिक से निकाल कर Atheist(नास्तिक) में डाल दिया।
           फ़ादर मैं इस्लाम का हितेषी नही हूँ लेकिन आपको बता दूँ क्रिस्चियनों ने सन् 1096 में ने "Crusade War" धर्म के आधार पर ही स्टार्ट किया था जिसमें पहला हमला क्रिस्चियन समुदाय ने मुसलमानों पर किया, जिसमें लाखों मासूम मारे गए, फ़ादर "आयरिश आर्मी" का इतिहास पढ़ो किस तरह कैथोलिकों ने धर्म के नाम पर क़त्ले आम किया जो आज के 'आईएसआईएस' से भी ज़्यादा भयानक था, धर्म के नाम पर क़त्लेआम करने में क्रिस्चियन मुसलमानों के समान ही हैं, वहीँ आपने हिन्दुओँ को बदनाम किया तो आपको बता दूँ की "हिन्दू ने कभी भी दूसरे धर्म वालों को मारने के लिए पहले हथियार नही उठाया है, बल्कि अपनी रक्षा के लिए हथियार उठाया है।
6. फ़ादर आपने कहा की हिन्दुओँ में नंगे बाबा घूमते हैं "हिन्दू बेशर्म" हैं तो फ़ादर आपको याद दिला दूँ कि  बाइबिल के अनुसार यीशु ने प्रकाशितवाक्य (Revelation) में कहा है की " nudity is best purity" नग्नता सबसे शुद्ध है, यीशु कहता है की मेरे प्रेरितों अगर मुझसे मिलना है तो एक छोटे बच्चे की तरह नग्न हो कर मुझसे मिलों क्योंकि नग्नता में कोई लालच नही होता, फ़ादर याद करो यूहन्ना का वचन 20:11-25 और लूका के वचन 24:13-43 क्या कहते नग्नता के बारे में, फ़ादर ईसाईयत में सबसे बड़ी प्रथा Bapistism है, जो बाइबिल के अनुसार येरूसलम की यरदन नदी में नग्न होकर ली जाती थी, अभी इस वर्ष फ़रवरी में ही न्यूजीलैंड के 1800 लोगों ने जिसमे 1000 महिलाएं थी ने पूर्णतः नग्न होकर बपिस्टिसम लिया, और आप कहते हो की हिन्दू बेशर्म है।
         अब तक चर्च के सभी लोग मुझ पर भड़क चुके थे और ग़ुस्से में कह रहे थे आप यहाँ क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट होने नही आये हो आप फ़ादर से बहसः करने आये हो, परमेश्वर आपको माँफ नही करेगा, मैंने फ़ादर से कहा की यीशु ने कहा है " मेरे प्रेरितों मेरा प्रचार- प्रसार करो" अब जब आप यीशु का प्रचार करोगे तो आपसे प्रश्न भी पूछे जाएँगे आपको ज़बाब देना होगा, मैं यीशु के सामने बैठा हुआ हूँ और वालंटियर क्रिस्चियन बनने आया हूँ, मुझे आप सिर्फ़ ज्ञान के सामर्थ्य पर क्रिस्चियन बना सकते है धन के लालच में नही! अब फ़ादर ख़ामोश बैठा हुआ था शायद सोच रहा होगा की आज किस से पाला पड़ गया, मैंने फिर कहा फ़ादर आप यीशु के साथ गद्दारी नही कर सकते " आप यहाँ सिद्ध करके दिखाओ की ईसाईयत हिंदुत्व से बेहतर कैसे है" ?
मैंने फिर फ़ादर से कहा ---- फ़ादर ज़वाब दो आज आपसे ही ज़वाब चाहिए क्योंकि आपके ये 30 ईसाई इतने सामर्थ्यवान नही है की ये हिन्दू के प्रश्नों का ज़वाब दे सकें, फ़ादर अभी भी शाँत था, मैंने कहा फ़ादर अभी तो मैंने शास्त्र खोले भी नही है शास्त्रों के ज्ञान के सामने आपकी बाइबिल कहीं टिकती भी नही है।
 अब फ़ादर ने काफ़ी सोच समझकर रविश स्टाइल में मुझसे पूछा 'आप किस जाति से हो'------!
         मैंने भी चाणक्य स्टाइल में ज़वाब दे दिया, मैं सेवार्थ शुद्र, आर्थिक वैश्य, रक्षण में क्षत्रिय, और ज्ञान में ब्राह्मण हूँ-- और हाँ फ़ादर मैं कर्मणा "फ़ौजी" हूँ और जाति से "हिन्दू"------ - अब चर्च में बहुत शोर हो चूका था मेरे जूनियर बहुत खुश थे बाकि सभी ईसाई मुझ पर नाराज़ थे, लेकिन करते भी क्या मैने उनकी ही हर बात को काटने के लिए बाइबिल को आधार बना रखा था और हर बात पर बाइबिल को ही ख़ारिज कर रहा था। मैंने फ़ादर से कहा मेरे ऊपर ये जाति वाला मन्त्र ना फूँके, आप सिर्फ़ मेरे सवालों का ज़वाब दें ! अब मैंने उन परिवारों को जो कन्वर्ट होने के लिए आये थे को कहा " क्या आप लोगों को पता है की वेटिकन सिटी एक हिन्दू से क्रिस्चियन कन्वर्ट करने के लिए मिनिमम 2 लाख रुपये देती है ! जिसमें से आपको 1लाख या 50 हज़ार दिया जाता है बाकि में 20 से 30 हज़ार तक आपको कन्वर्ट करने के लिए चर्च लेकर आने वाले आदमी  को दिया जाता है बाकी का 1 लाख चर्च रखता है, जब आप कन्वर्ट हो जाते हो तब आपको परमेश्वर के नाम से डराया जाता है फिर आपको हर सन्डे चर्च आना पड़ता है और हर महीने अपनी पॉकेट मनी या फिक्स डिपाजिट चर्च को डिपॉजिट करना पड़ता है, आपको 1 लाख देकर चर्च आपसे कम से कम दस लाख वसूल करता है, अगर आपके पास पैसा नही होता तो आपको परमेश्वर के नाम से डराकर आपकी जमीन किसी क्रिस्चियन ट्रस्ट के नाम पर डोनेट (दान) करा ली जाती है, अब आप मेरे सीनियर को ही देख लो, इन्होंने कन्वर्ट होने के लिए 1 लाख लिया था लेकिन 4 साल से हर महीने 15 हज़ार चर्च को डिपाजिट कर रहे हैं, अभी भी वक्त है सोच लो।
       आप सभी को बता दूँ की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में धार्मिक आधार पर सबसे ज़्यादा जमीन क्रिस्चियन ट्रस्टों पर हैं, जिन्हें आप जैसे मासूम कन्वर्ट होने वालो से परमेश्वर के नाम पर डरा कर हड़प लिया गया है, अब मेरा इतना कहते ही सारे क्रिस्चियन भड़क चुके थे तभी यहाँ के पादरी ने गोआ वाले फ़ादर से कहा की 11बज चुके हैं चर्च को बन्द करने का टाइम है, मैंने फ़ादर से कहा की आपने मेरे सवालों का ज़वाब नही दिया मैं आपसे बाइबिल पर चर्चा करने आया था, आप जो पैसे लेकर कन्वर्ट करते हो वो बाईबल में सख्त मना है याद करो गेहजी, यहूदा इस्तविको का हस्र जिसनें धर्म में लालच किया। जिस तरह परमेश्वर ने उन्हें मारा ठीक उसी तरह आपका ही परमेश्वर आपको मारेगा, आप में से किसी भी क्रिस्चियन को जो पैसे लेकर कन्वर्ट हुआ फ़िरदौस ( यीशु का राज्य) में प्रवेश नही मिलेगा। अब चर्च बंद होने का समय हो चूका था मैंने जाते जाते फ़ादर को "थ्री इडियट" स्टाइल में कहा " फ़ादर फिर से बाईबल पढ़ो समझों, और जहाँ समझ ना आये तो मुझे फ़ोन करके पूछ लेना क्योंकि मैं अपने कमज़ोर स्टूडेंट का हाथ कभी नही छोड़ता और आते- आते मैं सारे क्रिस्चियनों को बोल आया की "मेरे क्रिस्चियन भाइयों अपने वेटिकन वाले आकाओं को बता दो की भारत से ईसाईयत का बोरी बिस्तर उठाने का समय आ गया है उन्हें बोल दो अब भारत में हिन्दू जाग चुका है अब हिन्दू ने भी शस्त्र के साथ शास्त्र उठा लिया है जितना जल्दी हो यहाँ से कट लो"--!
 जय हिन्द जय भारत 
धन्यवाद 
(अशोक)
          (यह लेख मैंने एक मित्रा से लिया है जिसका नाम अशोक है जो इसाइयत के जाने-माने विद्वान हैं । )