मंगलवार, 10 जनवरी 2012

स्वामी विबेकानंद----- जिन्होंने भारत माता को ही अपना प्रथम देवता माना.

        यदा-यदा ही धर्मस्य ----जब-जब धर्म की हानि होती है अधर्म [राष्ट्र विरोध]बढ़ता है मै [भगवान] पृथ्बी पर जन्म लेता हू, ऐसे स्वामी विबेकानंद के रूप में इश्वर ने अपना अंश नरेन्द्र के रूप में विश्वनाथदत्त जो पश्चिमी सभ्यता के प्रति आस्था रखने वाले थे, के यहाँ १२ जनवरी १८६३ को जन्म लिया, यह कौन जनता था की यही बालक पाश्चात्य जगत को हिन्दू [सनातन]  धर्म के तत्वज्ञान का सन्देश सुनाने वाला, उतिष्ठित-जागृत का सन्देश देने वाला, गुलामी को झेलते हुए 'गर्व से कहो की हम हिन्दू है' का प्रेरक वाक्य द्वारा हिन्दू समाज को गौरव बोध कराने वाला, महान विश्व गुरु होगा, बचपन में पिता की मृत्यु के कारन दरिद्रता ने उनकी स्थित दयनीय बना दिया था, गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस के प्रथम मिलन ने ही उनका जीवन ही बदल दिया और वे नरेन्द्र से विबेकानंद बन गए, वे रामकृष्ण परमहंस के स्वर्गवासी होने के बाद भारत भ्रमण के लिए निकल गए भारत माता की परिक्रमा करने के पश्चात् कन्याकुमारी में समुद्र के बीच एक शिला पर बैठकर तीन दिन तक साधना में लीन होकर माँभारती के दर्शन किये.
           वे दरिद्रनारायाण में ही इश्वर के दर्शन करते थे महान देशभक्त थे कहते थे कि भारत मानवता का सन्देश देने वाला वेदों के अनुसार जीवन जीने वाला पेड़- पौधों, पशु-पक्षियों, में जीवन आत्मा का दर्स्शन करने वाला नदियों और पहाड़ो में भगवान के दर्शन करने वाला भोला-भला समाज अपने गौरव शाली अतीत को भूल गया है उसे अपने इतिहास जो ब्राहमणग्रंथो और पुराणों में है उसपर गर्व करना होगा, स्वामी जी को सन १८९३ में सिकागो विश्व धर्म -परिषद्  में भारत प्रतिनिधि के रूप में पहुचे परिषद् में प्रवेश मिलना ही कठिन हो गया, उनको समय न मिले इसका भरपूर प्रयास किया गया, भला पराधीन भारत क्या सन्देश देगा, सारा यूरोप तो भारत के नाम से ही घृणा करता था एक अमेरिकन के उद्द्योग से किसी प्रकार समय मिला और ११ सितम्बर १८९३ के उस दिन उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पश्चात् जगत को चौका दिया वे १८९६ तक अमेरिका में रहे और वैदिक संस्कृति का प्रचार करते रहे.
            स्वामी जी उस धर्मसभा में समापन के अवसर पर बोलते-बोलते अपना भाषण कहा समाप्त करे समझ नहीं पा रहे थे उन्होंने एक कथा सुनाई मै उस कथा का उल्लेख करना चाहता हू उन्होंने बताया की मेरे बाबा कहानी सुनाया करते थे , की एक समुद्र का मेढक समुद्र से बहार निकल कर घुमने लग घूमते - घूमते थक कर पुनः समुद्र में जाने लगा की वह एक कुए में गिर गया कुए में बहुत सारे मेढक रहते थे उससे पूछने लगे की तुम्हारा नाम क्या है, कहा से आये हो समुद्र मेढक ने कहा की ये मेरा नाम है मै समुद्र में रहता हू तब-तक एक मेढक ने पूछा की तुम्हारा समुद्र कितना बड़ा है समुद्री मेढक ने कहा की मेरा समुद्र तो बहुत बड़ा है, कुए के एक मेढक ने अपने स्थान से तिन फिट उछला -- क्या तुम्हारा समुद्र इतना बड़ा है समुद्री मेढक ने कहा की मेरा समुद्र तो बहुत बड़ा है तब-तक एक दूसरा मेढक अपने स्थान से पाच फिट उछल जाता है कहा कि क्या तुम्हारा समुद्र इतना बड़ा है ? समुद्री मेढक ने फिर बताया की मेरा समुद्र तो बहुत बड़ा है तब-तक तीसरा मेढक कुए के एक छोर से दूसरी छोर तक उछला क्या तुम्हारा समुद्र इस कुए के बराबर है ? इस मेढक ने कहा की कैसे मै समझाऊ कि मेरा समुद्र कितना बड़ा है, स्वामी जी उस भाषण को करते हुए कहा कि जैसे समुद्र का मेढक कुए के मेढको को यह बता नहीं पा रहा था कि मेरा समुद्र कितना बड़ा है, मै जिस भारत माता और हिन्दू संस्कृति का वर्णन कर रहा हू जिस वैदिक संस्कृति का वर्णन कर रहा हू वह कितना महान है मै आपको बता नहीं पा रहा हू, स्वामी जी का भाषण आज भी उतना ही प्रशंगिक है.
         स्वामी जी ने अमेरिका में कई स्थानों पर भाषण करते हुए कहा कि हे पादरियों तुम्हारे कर्म तो इतने घिनौने है कि हिंदमहासागर का सारा का सारा कीचड़ तुम्हारे मुह पर मार दिया जाय तो भी कम है तुम लोगो ने धर्म को ब्यापार बनाकर भोले-भाले भारतीयों को एक दवा की गोली देकर धर्म परिवर्तन कर मानवता को तारा-तर करना भविष्य का इतिहास माफ़ नहीं करेगा, जब वे अमेरिका से लौटे तो समुद्र के किनारे वे लोटने लगे स्वागत करते वालो ने पूछा कि स्वामी जी मिटटी में लोटकर कपडा गन्दा करना ----- स्वामी जी ने उत्तर दिया कि समुद्र लंघन करना पश्चिम में रहने से सरीर असुद्ध हो गयी है भारत माता कि गोद में लोट-पोट करने से सब सुद्ध हो गया ,ऐसे थे हमारे प्रेरणा के श्रोत स्वामी विबेकानंद जी . रोमा रोला ने ठीक ही कहा था -----'उनका बचपन और युवा अवस्था के बीच का काल यूरोप पुनरुज्जीवन-युग के किसी कलाकार राजपुत्र के जीवन -प्रभात का स्मरण करता है '.
         वे कहा करते थे --मै कोई तत्ववेत्ता नहीं हू न तो संत या दार्शनिक हू, मै तो गरीब हू और गरीबो का अनन्य भक्त हू, मै तो सच्चा महात्मा उसी को कहूगा जिसका ह्रदय गरीबो के लिए तड़पता हो, ४ जुलाई १९०२ को उस महान बिभूति ने पार्थिव शारीर को त्याग दिया किन्तु स्वामीविबेकानंद तो भारतीय ह्रदय में अमर है और अमर है उनका हिन्दू -धर्म एवं भारतीय संस्कृति.           

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