आदि जगद्गुरु रामानंदाचार्य का जन्म ऐसे समय हुआ था जब देश पर केवल गुलामी का संकट ही नहीं था, बल्कि हमारी संस्कृति व धर्म बचेगा या नहीं यह कह पाना भी कठिन था, वे पहले ऐसे आचार्य थे जो उत्तर भारत में जन्म लेते है उनका जन्म प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्रह्मण पिता पुण्यसदन शर्मा और माता सुशीला शर्मा के यहाँ १५ जनवरी १२९९ को हुआ वैसे रामानंद संप्रदाय की मान्यता है की इनका प्राकट्य माघ कृष्ण सप्तमी १३५६ सम्बत में हुआ इनकी शिक्षा- दिक्षा काशी के गुरु राघवानंद के सानिध्य में हुई, काशी विद्वानों की नगरी कही जाती है उसे भारत के सांस्कृतिक राजधानी होने का गौरव प्राप्त है, उनका प्रादुर्भाव उस समय हुआ जब एक हाथ में तलवार दुसरे हाथ में कुरान लेकर भारत को रौदने का प्रयास हो रहा था भारतीय राजा और राजनीती लगभग हार स्वीकार करने के बहुत नजदीक पहुच चुकी थी.
ऐसे समय रामानंदाचार्य ने जाति, भाषा और प्रान्त से ऊपर उठकर राष्ट्राबाद का अनूठा प्रयोग किया वे पहले आचार्य है जिन्होंने भगवन श्री राम को परमेश्वर स्वीकार कर --ब्रम्ह, श्रीराम और भारत को एक रूप कर दिया, श्रीराम को भारतीय राष्ट्रीयता के प्रतिक रूप में खड़ा कर दिया उन्होंने कहा 'कलयुग केवल नाम अधारा' और इसी को आधार मानकर भारत के बिभिन्न क्षेत्रो, जातियों और भाषाओ से बड़े-बड़े संत खड़े कर दिए उन संतो ने श्रीराम के नाम को आधार लेकर पूरे भारत में अलख जगाकर बिधर्मियो को मुहतोड़ जबाब दिया.
वे समरसता के महान जीवित मूर्ति थे जहा उन्होंने कबीर जैसे जुलाहे रबिदास जैसे दलित को अपने आत्मीयता से देश का सिर मौर बना दिया वही कुम्हन दास, धन्ना जाट, पीपा, नाभा, सेन, भावानन्द, इत्यादि को इतनी आध्यात्मिक उचाई पर पहुचाया जिन्हें द्वादस भगवत कहा जाता था, कोई शंकरदेव होगे असम में जिन्होंने रामानंदी परंपरा को स्वीकार कर असम को बिधर्मी होने से बचाया, वही कोई चैतन्य महाप्रभु होगे जिन्होंने इसी परंपरा द्वारा बिधर्मी हुए बंधुओ को घर वापसी की, दक्षिण स्वामी रामतीर्थ होगे ऐसा अलख जगाया की डंके की चोट पर शिवाजी महराज ने हिन्दवी साम्राज्य की स्थापना किया, देश भर में बिभिन्न अखाड़ो की स्थापना कर नागाओ की फ़ौज खरीकर धर्म रक्षा की परंपरा कायम कर हिन्दुओ में स्वाभिमान जागृत किया.
वैष्णव के बावन द्वारो में ३७ द्वार रामानंद संप्रदाय से ही जुड़े है इनकी शाखा, प्रशाखा जैसे कबीर दासी, दादूपंथी, राम स्नेही, घासी पंथी इत्यादि के श्रोत है, इतिहास साक्षी है कि बल पूर्बक इस्लाम धर्म स्वीकार किये हिन्दुओ को फिर से हिन्दू धर्म लाने का परावर्तन का महान कार्य उस काल में सर्व प्रथम रामानंद ने प्रारंभ किया, अयोध्या के राजा हरी सिंह के नेतृत्व में चौतीस हज़ार राजपूतो की एक ही मंच पर स्वधर्म में आने के लिए प्रेरित कर शंकराचार्य की परंपरा को जिबित किया.
वैष्णव के बावन द्वारो में ३७ द्वार रामानंद संप्रदाय से ही जुड़े है इनकी शाखा, प्रशाखा जैसे कबीर दासी, दादूपंथी, राम स्नेही, घासी पंथी इत्यादि के श्रोत है, इतिहास साक्षी है कि बल पूर्बक इस्लाम धर्म स्वीकार किये हिन्दुओ को फिर से हिन्दू धर्म लाने का परावर्तन का महान कार्य उस काल में सर्व प्रथम रामानंद ने प्रारंभ किया, अयोध्या के राजा हरी सिंह के नेतृत्व में चौतीस हज़ार राजपूतो की एक ही मंच पर स्वधर्म में आने के लिए प्रेरित कर शंकराचार्य की परंपरा को जिबित किया.
वास्तव में यदि हम देखे तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामानंद की प्रेरणा से ही रामचरित मानस लिखकर रामलीला का मंचन कराकर भारतीय राष्ट्राबाद को ही पुष्ट किया और धर्म को बचाने में अहम् भूमिका निभाई जिस प्रकार जगद्गुरु शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म जो भारत को नपुंशक बनाकर पर्कियो को शासन सौप रहा था उसे समाप्त करने हेतु भारत के सांस्कृतिक राष्ट्राबाद हेतु चारो धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, बावन शक्ति पीठो की स्थापना और शास्त्रार्थ द्वारा बिधर्मियो को पराजित कर वैदिक धर्म की विजय पताका फहरायी उसी प्रकार स्वामी रामानंद ने २१ जातियों में अपने शिष्यों को संत बनाकर इतना प्रभावशाली किया कि केवल धर्म ही नहीं बचाया बल्कि मानवता को, भारत को बचाया आज भी वे हमारे प्रेरणा श्रोत बने हुए है, स्वामी जी भारत, हिन्दुसमाज की तपस्चर्या में १७७ वर्ष जीवित रहे सम्बत १५३२ यानि सन १४७६ में स्वर्ग सिधारे, वे आज भी भारत व हिन्दू समाज को सर्बाधिक प्रभावित करने वाले महापुरुष थे.उनके द्वारा रचित ग्रन्थ वैशानाव्मताब्ज भास्कर, श्री रामार्चनपद्धति, रामरक्षास्त्रोत, सिद्धांतपटल, ज्ञानशीला, ज्ञानपटल, ज्ञानतिलक और योगचिंतामणि इत्यादि अज भी हिन्दू समाज के अन्दर अध्यात्मिक ज्ञान व शांति का मार्ग प्रशस्त कर रहे है.
आज न तो रामानंद जैसे लोग रहे और ही उनके भक्तों की तरह.
प्रत्युत्तर देंहटाएंजगदगुरू रामानंदचार्य जी के बारे में जो जानकारी आपने प्रस्तुत की है,उसे पढ़ कर बहुत कुछ जानने का अवसर मिला । यह जानकारी प्रदान करने के लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं । मेरे नए पोस्ट "धर्मवीर भारती" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद .
प्रत्युत्तर देंहटाएंरामानंदी वैष्णवों के आराध्य आदि जगदगुरु स्वामी रामानंदाचार्य के प्राकट्य दिवस पर प्रकाशित आपके आलेख को पढ़ने का सुअवसर आज मिला। अति प्रसन्नता हुई। ये सही है कि आज देश में व्याप्त छुआ-छूत और ऊंच-नीच जैसे भेद-भाव को दूर करने के लिए स्वामी रामानंद जैसे महामनीषि की आवश्यकता है। एक काम आज भी समाज के कई हिस्सों में जारी है,लेकिन छोटे स्तर पर। संघ और उसके कई अनुषंगिक संगठन हिन्दु समाज को संगठित और बलशाली बनाने का कार्य प्रचार-प्रसिद्धी से दूर रहते हुए कर रहे हैं। मैं रामानंद सम्प्रदाय के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ,पंचगंगा घाट ,काशी से जुड़ा हूं,जहां रहते हुए स्वामीजी ने रामभक्ति की धारा को आमजन की झोंपड़ी तक पहुंचाने का महती कार्य किया था। मैं वर्तमान रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का दीक्षित शिष्य हूं.मेरा ब्लॉग-ramanandacharya.blogspot.com उसी मठ और परंपरा को समर्पित है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंpriya devkumar ji
प्रत्युत्तर देंहटाएंnamaste aapne bahut acchha likha hai aaj bhi ramanand ji ka bichar prasangik hai bahut-bahut dhanyabad.
इन्हीं विद्वानों से भारतभूमि बची हुयी है अभी और सभ्यता जीवित हैं । नमन है इन श्रेष्ठ महापुरुषों को।
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